'पटवा टोली' से एक साथ 8 बच्चों ने JEE Adv. में मारी बाजी, जानिए आखिर क्या है सफलता का राज?
हर साल की भांति इसबार भी पटवा टोली का डंका इंजीनियरिंग की परीक्षा में बजा. यहां के 8 छात्र-छात्राओं ने जेईई एडवांस में सफलता पायी.

Published : June 3, 2025 at 1:52 PM IST
गया: बिहार के गया में 'आईआईटीयन का गांव' नाम से मशहूर पटवा टोली का जलवा बरकरार है. JEE Main 2025 में 40 से अधिक छात्र-छात्राओं ने सफलता पायी थी. एक बार फिर JEE Advance 2025 में 8 छात्र-छात्राओं ने सफलता पायी है. रिजल्ट आने के साथ एक बार फिर इस गांव में खुशी का माहौल है.
जश्न का माहौल: सोमवार को रिजल्ट आते ही पावरलूम की आवाज ढोल नगारे में दब गयी. जैसे ही जेईई एडवांस का परिणाम आया वैसे ही पटवा टोली में रिजल्ट देखने के लिए दौड़ भाग शुरू हो गई. एक जेईई एडवांस परीक्षा में 8 स्टूडेंट ने सफलता प्राप्त कर की. फिर क्या, जश्न का माहौल शुरू हो गया?
वृक्ष द चेंज संस्था जो बच्चों को इंजीनियरिंग की तैयारी नि:शुल्क कराता है, उसके निदेशक चंद्रकांत पाटेश्वरी ने बताया कि संस्था के छात्रों ने बेहतर प्रदर्शन किया है. 90% से अधिक परसेंटाइल अंक हासिल किए हैं. बच्चों ने कठिन परिश्रम और अनुशासन के बल पर यह मुकाम हासिल किया है. उन्होंने बताया कि कशिश कुमारी को ओबीसी रैंक 8910 आया है.
इन्होंने पायी सफलता: शशिकांत कुमार ने 8001, मंत्रराज ने 81(पीडब्ल्यूडी) अभिनव आनंद 80(एससी), यशराज 9786 ओबीसी, शुभम कुमार ओबीसी 8292, मनीषा कुमारी 8732, केतन कुमार 12514(ओबीसी), अहाना 4029 (ओबीसी), राहुल कुमार 200 (ओबीसी), सारिका कुमारी 8131, सनिका कुमारी 11079, सावन कुमार 7000 रैंक प्राप्त किया है.

"राहुल कुमार ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन अभी वे दिल्ली में हैं. संस्था के छात्रों ने बेहतर प्रदर्शन किया है. हर साल यहां से छात्रों को सफलता मिली है. 28 में 8 छात्र-छात्राओं ने सफलता पायी है. 17 का चयन एनआईटी के लिए हुआ है." -चंद्रकांत पाटेश्वरी, निर्देशक, वृक्ष द चेंज संस्था
आपको बता दें कि पटवा टोली का यह संस्था वैसे बच्चों को तैयारी कराता है जो गरीब, असहाय, जिनके माता पिता आर्थिक रूप से कमजोर हैं. इसके अतिरिक्त और भी संस्थाएं काम करती हैं. कई छात्र-परीक्षा के बाद पटवा टोली से बाहर चले गए हैं. हालांकि आईआईटी की तैयारी कराने वालों का यह भी कहना है कि इस बार करीब 17 से अधिक बच्चे आईआईटी के लिए पास हुए हैं. जेईई मेन्स में भी 40 से अधिक बच्चे सफल हुए थे.
जेईई एडवांस पास करने वाली कशिश कुमारी के पिता नहीं है. उनके पिता का 2014 में देहांत हो गया था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, बल्कि कठिनाइयों और गम से बाहर निकाल कर संघर्ष किया. कशिश कुमारी खुद कहती हैं कि उनके घर की स्थिति पिता के देहांत के बाद काफी बिगड़ गई थी.
"किसी तरह मां मजदूरी कर हमें पाला और पढ़ाया है. आज हमने सफलता हासिल की है. उसमें मेरी मां का संघर्ष शामिल है. संस्थान ने ना सिर्फ हमें पढ़ाया, बल्कि मेरी मां को काम भी दिया. मेरी मां संस्थान में रसोईया का काम करती है." -कशिश कुमारी

पहली बार इंजीनियर कौन बना?: 1992 पहली बार जितेंद्र कुमार इस गांव से इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की थी. फिलहाल यूएसए में काम कर रहे हैं. जितेंद्र यहां के छात्रों के लिए प्रेरणा स्रोत बने इसके बाद चला सिलसिला अब तक जारी है. यहां के इंजीनियर विश्व के 18 देशों में काम करते हैं.
पटवा टोली की खासियत: आपको बता दें कि इस गांव की आबादी 20 हजार के आसपास है. यहां 8000 लोग पावरलूम चलाते हैं और 1000 के करीब हैंडलूम चलाते हैं. यहां पूरे दिन तो कभी-कभी रात में भी खटर खटर की आवाज आती रहती है. इसके बावजूद इस गांव में हर साल सबसे ज्यादा बच्चे इंजीनियरिंग की परीक्षा पास करते हैं.
पटवा टोली क्यों प्रसिद्ध: दरअसल, यह गांव बुनकरों के लिए जाना जाता है. यहां से रोजाना कई ट्रक वस्त्रों का निर्माण होता है. यहां के चादर, साड़ी, धोती, गमछा के अलावे कई कपड़े मशहूर हैं तो बिहार-झारखंड, यूपी दिल्ली से लेकर साउथ इंडिया तक जाते हैं.
जेईई एडवांस में मनीष वर्मा के बेटे की लंबी छलांग, खुश होकर नीतीश कुमार से मिलाने पहुंच गए

