3 हजार में एक पिस्टल, 20 का मिला था ठेका, बिहार के मुंगेर में अवैध गन फैक्ट्री का भंड़ाफोड़
कभी मुंगेर में बंदूक फैक्ट्रियां थी, लेकिन आज यह अवैध धंधा बन गया है. एक बार फिर पुलिस ने अवैध फैक्ट्री का खुलासा किया है.

Published : April 21, 2025 at 2:39 PM IST
|Updated : April 21, 2025 at 3:26 PM IST
मुंगेर: बिहार की राजधानी पटना से करीब 200 किलोमीटर दूर मुंगेर गन फैक्ट्री को लेकर हमेशा चर्चा में रहा है. ब्रिटिश काल में शुरू हुए गन फैक्ट्री में कई तो बंद हो गए. इसकी जगह अवैध हथियार निर्माण ने ले लिया. बीते साल 2024 में सिर्फ मुंगेर में एक दर्जन से ज्यादा मिनी गन फैक्ट्री का खुलासा हुआ. कई गिरफ्तारियां हुई लेकिन अवैध हथियार निर्माण पर रोक नहीं लग सका.
मुंगेर में अवैध गन फैक्ट्री का खुलासा : पुलिस की कार्रवाई के कारण मुंगेर में अवैध हथियार बनाने वाले कारीगर दूसरे शहरों की ओर रूख करने लगे. आसपास जिला भागलपुर, खगड़िया, बेगूसराय, लखीसराय, जमुई में धड़ल्ले से अवैध मिनी गन फैक्ट्री का संचालन किया जा रहा है. इस तरह का अवैध धंधा तो पटना समेत पूरे बिहार में फैल चुका है.
कई जिलों में गन फैक्ट्री के खुलासे से हड़कंप : कई जिलों की कार्रवाई में मुंगेर कनेक्शन सामने आया है. बीते साल 2024 में राजधानी पटना समेत पूरे बिहार में अवैध मिनी गन फैक्ट्री का खुलासे की 70 से ज्यादा खबरें आयी है. इसका खुलासा खुद पुलिस के द्वारा किया जाता रहा है.
अप्रैल में 5 मिनी गन फैक्ट्री पकड़े गए : मुंगेर एसपी सैयद इमरान मसूद के अनुसार अप्रैल 2025 में अब तक 5 मिनी गन फैक्ट्री का उद्भेदन किया गया है. 20 अप्रैल को मुफस्सिल थाना क्षेत्र के गंगापार टीकारामपुर के अगरसिया बहियार में मिनीगन फैक्टरी का उद्भेदन कर तीन कारीगरों को गिरफ्तार किया गया. हालांकि इस दौरान हथियार बनवाने वाले ठेकेदार व तीन अन्य कारीगर जंगल का फायदा उठाकर भाग खड़ा हुए.
20 पिस्टल का मिला था ऑर्डर: गिरफ्तार कारीगर में मिर्जापुर बरदह निवासी मोहम्मद नौसाद उर्फ भोकचू, मोहम्मद शमशाद और मोहम्मद शजमूल उर्फ छोटू शामिल हैं. एसपी के मुताबिक पूछताछ में बताया कि वे लोग ठेकेदार के कहने पर काम करते हैं. ठेकेदार के द्वारा 20 पिस्टल बनाने का ऑर्डर मिला था. इसमें 7 पिस्टल तैयार हो गया था. सिर्फ फिनिशिंग टच देना था. इसी बीच पुलिस की छापेमारी हो गयी.
3000 में एक पिस्टल : कारीगर के मुताबिक प्रति पिस्टल 3000 रुपया तय किया गया था. कारीगर के मुताबिक एक दर्ज हथियार बनाने वालों से उसका संपर्क है. ऑर्डर के मुताबिक कारीगर को काम में लगाया जाता है.
"पुलिस जब छापेमारी करने पहुंची तो वहां पर ठेकेदार भी था.जंगल का फायदा उठाकर ठेकेदार और तीन कारीगर फरार हो गए. गिरफ्तार करीगरों ने ठेकेदार और फरार होने वाले कारीगरों का नाम व पता बताया. सभी मिर्जापुर बरदह गांव के रहने वाले हैं. गिरफ्तारी के लिए पुलिस छापेमारी कर रही है." -सैयद इमरान मसूद, मुंगेर एसपी

पांच मिनी गन फैक्टरी का उद्भेदन: एसपी ने बताया कि कुल पांच मिनी गन फैक्टरी का उद्भेदन हुआ है. इसमें 7 अर्धनिर्मित पिस्टल है जो फिनिसिंग स्टेज में था, 2 मैगजीन, 14 अर्धनिर्मित मैगजीन, 5 बेस मशीन, 2 हैंड ड्रील मशीन, 5 पिस्टल का स्लाईडर,2 अर्धनिर्मित बैरल,हैंड डाय,मैगजीन फर्मा,साइकिल का फ्रॉक, 3 मोबाइल सहित हथियार बनाने के अन्य छोटे-बड़े औजार शामिल बरामद हुए हैं.
'कच्चा माल और भोजन मिलता है': हथियार बनाने वाले कारीगर ने खुलासा किया कि ठेकेदार उसे हथियार बनाने के लिए कच्चा माल देता था. मशीन व उपकरण भी वह ठेकेदार देता है. कम समय में हथियार की आपूर्ति लेने के लिए कारीगरों को खाना उपलब्ध करना ठेकेदार का काम है. ताकि कम समय में ज्यादा हथियार का निर्माण हो सके.
ब्रिटिश सरकार में हथियार निर्माण: जानकार बताते हैं कि मुंगेर में हथियार निर्माण का काम अंग्रेजों ने कराया था. अंग्रेज भारत आने के बाद पहली बार 1878 में आर्म्स एक्ट और 1924 में आर्म्स एक्ट मैनुअल बनाया. इस कानून के तहत ब्रिटिश सरकार ने मुंगेर सहित अन्य शहरों में करीब 20 लोगों को हथियार बनाने के लिए लाइसेंस दिया गया था.
देश आजादी के बाद 37 गन फैक्ट्री: देश आजादी के बाद 1948 में आर्म्स एक्ट और 1962 में आर्म्स रूल्स आए. इस कानून के तहत सारे बंदूक निर्माण इकाई को एक छत के नीचे लाया गया. यानि फैक्ट्री का निर्माण कर दिया गया. उस दौरान भारत सरकार ने पूरे देश में 105 निर्माताओं को हथियार बनाने के लिए लाइसेंस दिया था. सिर्फ मुंगेर में 37 निर्माताओं को बंदूक निर्माण का लाइसेंस दिया गया था.

भारत-चीन युद्ध हथियार सप्लाई: साल 1962 में भारत चीन युद्ध में मुंगेर बंदूक फैक्ट्री का अहम योगदान था. भारतीय सेना के लिए मुंगेर से ही मस्कट राइफल तैयार किया गया था. यानि उस समय पूरे देश में मेड इन मुंगेर हथियार की चर्चा होने लगी थी. एक तरह से मुंगेर हथियारों का शहर हो गया था. कई दुकानें खोली गयी थी. कई लोगों को रोजगार भी मिला था. लेकिन दयनीय हालत के कारण कई मजदूरों ने काम छोड़कर कोई और रोजगार करने लगे तो कई अवैध हथियार निर्माण में जुट गए.
कभी मुंगेर की बंदूक फैक्ट्री में 1500 से ज्यादा हथियार बनाने वाले कुशल कारीगर थे, लेकिन अब 100 भी नहीं हैं. कई रिटायर हो गए तो कई ने नौकरी छोड़ दी. पेट पालने के लिए छोटा-मोटा काम करने लगे. कई ऐसे मजदूर हैं जिन्हें पेंशन के नाम पर मात्र एक हजार रुपया दिया जाता है.
अवैध धंधा के कारण: हथियार का लाइसेंस लेने और ज्यादा कीमत पर हथियार खरीदना आसान नहीं है. इसलिए अवैध हथियार की डिमांड बढ़ने लगी. इसके बाद जिले के गांव-गांव में अवैध हथियार बनाने का कुटिर उद्योग शुरू हो गया. जिले के चुरंबा, बरदह, नया गांव, तौफिर दियारा, मस्कतपुर, शादीपुर सहित कई नक्सल इलाकों में अवैध हथियार बनाए जाने लगा.
बंदूक फैक्ट्री बंद: अवैध हथियार बनने के भी कई कारण है. फैक्ट्री में काम करने वाले कारीगर के पास कोई काम नहीं मिला तो मजबूरी में अपने हुनर से अवैध हथियार बनाने लगे. कई के घरों का चूल्हा इसी अवैध धंधों से चलता है. ना तो स्थानीय प्रशासन और ना ही सरकार ने हथियार बनाने वाले कीरगरों के लिए किया. कई बंदूक फैक्ट्री बंद होना भी इसका बड़ा कारण है.
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