ऐतिहासिक धरोहर रामगढ़ पर्वत में दरारें, लैंडस्लाइडिंग, अस्तित्व बचाने शुरू हुआ संघर्ष
रामगढ़ पर्वत लोगों की आस्था का केंद्र है, लेकिन इसका अस्तित्व खतरे में है. इसे बचाने के लिए लोगों ने मुहिम शुरू की है.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : August 30, 2025 at 6:21 PM IST
|Updated : August 30, 2025 at 6:29 PM IST
सरगुजा: कहा जाता है कि वनवास काल के दौरान भगवान राम ने छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा समय बिताया. वनवास के 14 साल में से 10 साल भगवान राम ने छत्तीसगढ़ के जंगलों में बिताए थे. उस समय इस क्षेत्र को दंडकारण्य कहा जाता था. धार्मिक जानकार कहते हैं कि इसी दौरान भगवान राम ने सरगुजा के रामगढ़ पर्वतों पर भी कुछ समय बिताया. महाकवि कालिकास का महाकाव्य मेघदूतम की रचना स्थली भी रामगढ़ को माना गया है. वनवास के दौरान मां सीता ने जिस पवित्र कुंड में स्नान किया था वह रामगढ़ में है और इस बात का उल्लेख महाकाव्य मेघदूतम में है. भरतमुनि की नाट्यशाला में जो वर्णन है, वैसी नाट्यशाला भी यहीं पर स्थित है. लेकिन स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र रामगढ़ के अस्तित्व पर अब खतरा मंडरा रहा है.
रामगढ़ पर्वत के अस्तित्व पर खतरा क्यों: कई दिनों से रामगढ़ पर्वत में दरारें आ रही है, लैंडस्लाइडिंग हो रही है. जिससे पर्वत का अस्तित्व अब खतरे में दिख रहा है. सरगुजा में स्थित धार्मिक, साहित्यिक और पुरातात्विक धरोहर को बचाने रामगढ़ बचाओ संघर्ष समिति का गठन हो चुका है. समिति के लोगों का आरोप है कि पर्वत पर ये दरारें और लैंडस्लाइडिंग बीते कुछ वर्षों में शुरू हुई है. रामगढ़ बचाओ संघर्ष समिति और स्थानीय लोगों का कहना है कि पर्वत के नजदीक कोल उत्खनन है. जब खदान में कोयला निकालने ब्लास्टिंग की जाती है तो रामगढ़ का पर्वत भी हिलने लगता है.
रामगढ़ पर्वत बचाने संघर्ष समिति का गठन: स्थानीय ग्रामीण और संघर्ष समिति के सदस्य रोहित टेकाम कहते हैं " जब से यहां कोल माइंस का काम चालू हुआ, तब से यहां ब्लास्टिंग होती है और रामगढ़ पर्वत में कंपन होता है. कंपन की वजह से पर्वत पर कई जगह दरारें भी आ रही हैं. आप स्वयं देख रहे हैं कि पेड़ और पहाड़ का हिस्सा टूट कर गिर रहा है. हम लोग चाहते हैं कि रामगढ़ जैसे ऐतिहासिक स्थल का संरक्षण हो ताकि इसका कोई नुकसान ना हो. हम चाहते हैं की सरकार हमारी बात सुने और इसका संरक्षण करे. यदि सरकार हमारी बात नहीं सुनती है तो आगे की लड़ाई लड़ने हम तैयार रहेंगे. "

धार्मिक ग्रंथों में रामगढ़ का उल्लेख: रामगढ़ पर शोध करने वाले पंडित योगेश नारायण मिश्र कहते है " हमारे धार्मिक ग्रंथों में यह उल्ल्केख मिलता है कि सरगुजा में वह स्थान है जहां भगवान राम वनवास के दौरान कुछ समय रुके थे. महाकवि कालीदास की रचना मेघदूतम में यह उल्लेख है कि 'जनक तनया स्नान पुण्योदकेशु' यानी माता सीता के स्नान किये हुए पवित्र कुंड जहां हैं वो रामगढ़ है, साथ ही आषाढ़ के प्रथम दिवस पर यहां साहित्य संगोष्ठी के साथ बहुत बड़ा मेला लगता है, क्योंकि आषाढ़ के प्रथम दिवस की कल्पना पर मेघ को दूत बनाकर अपने प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए अलकापुरी तक का मार्ग रामगढ़ से चुना गया था."

रामगढ़ की पहाड़ियों से करीब 9-10 किलोमीटर की दूरी पर राजस्थान राज्य विद्धुत निगम लिमिटेड की कोयला खदानें संचालित हैं. पर्वत में डिस्टर्बेंस के लिए कोल खदान को कारण माना जा रहा है. लिहाजा हमने इस विषय पर भूगोल के जानकार डॉ. अनिल कुमार सिन्हा से बातचीत की.

पर्वत के घनत्व में छेड़ाछाड़ करने पर ऊपरी भाग हो सकता है असंतुलन: डॉ. अनिल कुमार सिन्हा बताते हैं "जिओलॉजी के हिसाब से हिसाब से पर्वतों का घनत्व कम होता है लेकिन जिओ मैथोलाजी में एक आइसोस्टेसी का सिध्दांत है की पृथ्वी के निचले भागों में एक क्षतिपूर्ती तल होता है. जहां जितना ऊंचा कोई पर्वत है उससे ज्यादा गहरा नीचे जमीन में उसकी रूट होती है और निचला भाग ज्यादा घनत्व का होता है. लेकिन इस घनत्व में अगर भिन्नता होती है या इस घनत्व में कहीं छेड़छाड़ करने की स्थिति आती है तो पृथ्वी का उपरी भाग असंतुलित होगा और असंतुलन का जो मतलब है कि उसके स्वरुप में बदलाव हो सकता है. किसी भी पर्वत में होने वाली मानव गतिविधियों से ये हो सकता है. हमारे सरगुजा में भी बहुत सी कोल खदाने हैं. उनसे ये हो सकता है."

रामगढ़ संघर्ष समिति के साथ पूर्व डिप्टी सीएम: ये मामला सिर्फ ग्रामीणों तक ही सीमित नहीं रह गया है. बल्कि ये बड़ा सियासी मसला भी बनने जा रहा है. कांग्रेस नेता और प्रदेश के पूर्व डिप्टी सीएम टी एस सिंहदेव भी इस समिति के साथ खड़े हो चुके हैं. वो भी ये मानते हैं की कोल खदनों की वजह से रामगढ़ पर संकट आ रहा है. हसदेव क्षेत्र में नए कोल प्रोजेक्ट को दी गई मंजूरी को गलत बताते हुए प्रदेश के पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने कहा है कि इस प्रोजेक्ट के कारण आने वाले समय में रामगढ़ पहाड़ का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा. गलत तरीके से अधूरी जानकारी प्रस्तुत कर खदान को सहमति दी गई और यह प्रक्रिया ही दोषपूर्ण है. उन्होंने कहा कि भूपेश सरकार के कार्यकाल में भी तत्कालीन कलेक्टर ने कोल ब्लॉक को मंजूरी देने के लिए रामगढ़ के श्रीराम मंदिर के बजाए दो किलोमीटर आगे सीता बेंगरा से दूरी की रिपोर्ट दी. वर्तमान में कोल ब्लॉक की दूरी का गलत आंकलन कर डायवर्सन के लिए रिपोर्ट भेजी गई है. इस कोल ब्लॉक के न खुलने से किसी को नुकसान नहीं होगा, लेकिन खुलने से ऐतिहासिक धरोधर को नहीं बचा सकेंगे. "

सिंहदेव ने कहा "रामगढ़ पहाड़, जोगीमाड़ा गुफा, जोगीमाड़ा का पर्वत संरक्षित क्षेत्र है. यह ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है. यहां हर वर्ष रामनवमीं पर लाखों लोग दर्शन के लिए पहुंचते हैं. स्थानीय वनवासी एवं आदिवासियों की आस्था रामगढ़ पहाड़ से जुड़ी है. यही कारण है कि स्थानीय लोग इस पहाड़ के पास कोल खदान खोलने का लगातार विरोध कर रहे हैं. वर्ष 2020 में तत्कालीन सरगुजा कलेक्टर ने पीकेईबी खदान की दूरी सीताबेंगरा ने 11 किलोमीटर बताई थी. जबकि रिपोर्ट में रामगढ़ के ऐतिहासिक राममंदिर (जोगीमाड़ा) एवं रामगढ़ पहाड़ की दूरी नहीं बताई गई थी. वर्तमान में डीएफओ ने वन डायवर्सन के लिए दी गई सहमति में भी सीताबेंगरा तक की दूरी 11 किलोमीटर बताई है. खदान की सीमा के नजदीकी छोर के बजाए दूसरे नजदीकी छोर से यह दूरी नापी गई है. केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक की सीमा से रामगढ़ पहाड़ की दूरी 8.1 किलो मीटर, जोगीमाड़ा की दूरी 9.3 किलोमीटर है. यदि हमारा दावा गलत है तो दोबारा इसका नाप कराया जाए."

अगर प्रस्तावित कोल खदान इकोलाजिकल सेंसटिव क्षेत्र (राष्ट्रीय उद्धान, अभ्यारण्य, बायोसिक्योर रिजर्व, प्राकृतिक झील, वाटर बाडी, आदिवासी सेटेलमेंट क्षेत्र और धार्मिक स्थल) अगर 10 किलोमीटर के दायरे में है तो वहां वन अनापत्ति नहीं दी जा सकती है. रामगढ़ में धार्मिक स्थल रामगढ़ की पहाड़ी पर है. जहां राम-सीता समेत अन्य देवताओं का मंदिर है और वहां पूजा होते हैं. लेकिन खदान की अनापत्ति के लिए नाप रामगढ़ से नहीं बल्कि सीताबेंगरा से किया गया है. जबकि रामगढ़ पहाड़ी से केते एक्सटेंशन 3 की दूरी 8.1 किलोमीटर है. रामगढ़ मंदिर से एक्सटेंशन की दूरी 9.13 है.

पर्यटन मंत्री का दावा: इस मामले में पर्यटन, संस्कृति धर्मस्व एंव धार्मिक न्यास मंत्री राजेश अग्रवाल का कहना है "रामगढ़ के अस्तित्व पर कोई भी खतरा आयेगा तो हम डट कर मुकाबला करेंगे, लेकिन जो माइंस है उसकी मंजूरी मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री थे, टीएस सिंहदेव यहां के विधायक थे, तब मिली थी. खदान अब रामगढ़ से मोरगा की तरफ जा रहा है, अगर खतरा होता तो पहले होता. इसके बावजूद अगर रामगढ़, जो हमारी आस्था का प्रतीक है, हमारी राष्ट्रीय धरोहर है."
रामगढ़ पर्वत के अस्तित्व पर संकट की वजह प्राकृतिक प्रक्रिया भी है. क्योंकि बारिश की वजह से भी लैंड स्लाइडिंग जैसी स्थिति बनती है, लेकिन यहां बारिश के साथ साथ उत्खनन को भी कारण माना जा रहा है. ग्रामीणों का विरोध और फिर पक्ष विपक्ष दोनों के बयान रामगढ़ को बचाने के पक्ष में हैं, लेकिन अब देखना होगा की क्या कागजों में हेरा फेरी के आरोप सही हैं, क्या वाकई खदान की अनुमति के लिए खेल किया गया है, अगर खदान से पहाड़ पर संकट है तो क्या सरकार खदान आगे बढ़ने से रोकेगी या फिर रामगढ़ पर्वत भी अपने अस्तित्व की बाट जोहता रहेगा.

