Explainer : बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान : 225 ग्राम पंचायत कुप्रथा से आजाद, जानिए कैसे बदली सामाजिक सोच
छत्तीसगढ़ के एक जिले में 225 ग्राम पंचायतों को बाल विवाह मुक्त होने का दर्जा मिला है.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : October 9, 2025 at 6:00 PM IST
बलौदाबाजार : छत्तीसगढ़ में बाल विवाह जैसी कुप्रथा को रोकने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है. सरकारी प्रयास के कारण अब जिले के ग्राम पंचायतों को सबसे पहले बाल विवाह जैसी कुप्रथा को रोकने के लिए जागरुक किया जा रहा है. जिला प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रयासों से बलौदाबाजार के 225 ग्राम पंचायतों को बाल विवाह मुक्त घोषित हुए हैं. इन पंचायतों में पिछले दो साल से एक भी बाल विवाह का मामला सामने नहीं आया है.
जिला प्रशासन की निगरानी में हुआ काम : कलेक्टर दीपक सोनी के मार्गदर्शन और जिला कार्यक्रम अधिकारी अतुल परिहार के नेतृत्व में महिला एवं बाल विकास विभाग ने पंचायतों का रिकॉर्ड, शिकायतों और निगरानी रिपोर्ट की समीक्षा की. इसी के आधार पर तय किया गया कि ये पंचायतें अब बाल विवाह मुक्त घोषित की जाएं. हालांकि अंतिम घोषणा से पहले दावा-आपत्ति के लिए 13 अक्टूबर 2025 तक की समय सीमा तय की गई थी. जिसमें किसी ने भी दावा आपत्ति पेश नहीं किया.जिसके बाद ये 225 पंचायतें बाल विवाह मुक्त घोषित की गईं.
कितनी पंचायतें बाल विवाह मुक्त : बलौदाबाजार जिला मुख्यालय से मिली जानकारी के अनुसार कुल 225 पंचायतों की सूची तैयार की गई थी.इन पंचायतों की सूची प्रत्येक एकीकृत बाल विकास परियोजना कार्यालय और जिला कार्यक्रम अधिकारी, महिला एवं बाल विकास विभाग के कार्यालय में सार्वजनिक की गई थी, ताकि कोई भी व्यक्ति इसे देख सके और आपत्ति दर्ज करा सके.लेकिन दी गई तिथि तक किसी ने भी दावा आपत्ति पेश नहीं किया.

क्यों जरूरी है यह पहल? : बलौदाबाजार समेत छत्तीसगढ़ के कई ग्रामीण इलाकों में बाल विवाह सामाजिक परंपराओं और आर्थिक कारणों से लंबे समय से हो रहे हैं. प्रशासन और सामाजिक संगठनों के प्रयासों के बावजूद कई बार दबाव में या छिपाकर नाबालिग बच्चों की शादी करा दी जाती है. बाल विवाह का असर केवल बच्चों के वर्तमान पर नहीं, बल्कि भविष्य पर भी पड़ता है. लड़कियों की शिक्षा बाधित होती है. कम उम्र में मातृत्व से स्वास्थ्य संबंधी खतरे बढ़ जाते हैं. लड़कों की भी शिक्षा और करियर प्रभावित होते हैं. घरेलू हिंसा और सामाजिक शोषण के मामले बढ़ जाते हैं. ऐसे में पंचायतों को बाल विवाह मुक्त घोषित करना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक सामाजिक बदलाव का प्रतीक है.

इस बड़ी उपलब्धि को लेकर कलेक्टर दीपक सोनी ने कहा है कि ये हमारे लिए गर्व की बात है कि जिले की 225 पंचायतें बाल विवाह मुक्त घोषित हुईं हैं.

दो साल से एक भी मामला नहीं हुआ दर्ज : इन प्रयासों का नतीजा है कि जिले की 225 पंचायतों में लगातार दो वर्षों से कोई मामला दर्ज नहीं हुआ. महिला बाल विकास अधिकारी अतुल परिहार ने इस बारे में कहा कि बलौदाबाजार जिले की 225 पंचायतों को बाल विवाह मुक्त घोषित करने की प्रक्रिया हमारे विभाग के लिए गर्व का विषय है. पिछले दो वर्षों में विभाग ने पंचायत स्तर पर लगातार निगरानी और जागरूकता कार्यक्रम चलाएं, जिनमें आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, महिला समूह और पंचायत प्रतिनिधियों ने अहम भूमिका निभाई.

इन पंचायतों में बाल विवाह जैसी कुप्रथा पर पूरी तरह अंकुश लगा है. दावा-आपत्ति की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन्हें औपचारिक रूप से बाल विवाह मुक्त घोषित किया गया है. हम चाहते हैं कि आने वाले समय में जिले की हर पंचायत बाल विवाह मुक्त बने. हमारा फोकस केवल घोषणा तक सीमित नहीं है, बल्कि आगे भी सतत निगरानी की जाएगी - अतुल परिहार, महिला एवं बाल विकास अधिकारी
बाल विवाह रोकने के लिए अभियान : पिछले दो वर्षों में बलौदाबाजार जिला प्रशासन ने लगातार कई पहल की है. जिसके बाद बाल विवाह पर अंकुश लगा है.
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प्रशासन को तुरंत सूचना दें : आपको बता दें कि इस दौरान प्रशासन ने कहा है कि यदि कहीं भी बाल विवाह का मामला सामने आता है, तो तुरंत कार्रवाई की जाएगी और संबंधित पंचायत का दर्जा वापस ले लिया जाएगा. इसके लिए जिले के नागरिकों से अपील की गई है कि वे बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई को रोकने में सहयोग करें और यदि कहीं इस तरह की घटना की जानकारी हो तो तुरंत प्रशासन को सूचित करें.
बाल विवाह को रोकने क्या हैं कानून और नियम : भारत में बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 लागू है. इसके अनुसार लड़की की शादी की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष तय की गई है. नाबालिग की शादी करवाने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. इसमें शादी कराने वाले माता-पिता, रिश्तेदार, पुजारी और यहां तक की शादी में सहयोग करने वाले भी दोषी माने जाते हैं.छत्तीसगढ़ सरकार ने भी समय-समय पर विशेष अभियान चलाकर बाल विवाह रोकने के निर्देश दिए हैं. आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा, पटवारी और पंचायत प्रतिनिधि इस दिशा में निगरानी की भूमिका निभाते हैं
बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान : छत्तीसगढ़ में बाल विवाह के आंकड़ों में कमी देखी गई है. लेकिन इसे पूरी तरह से समाप्त करने के लिए सरकार ने संकल्प लिया है. इस अभियान को जन आंदोलन का स्वरूप दिया गया है. बाल विवाह से प्रदेश को मुक्त कराने के लिए पंचायती राज संस्था, नगरीय निकायों के जन प्रतिनिधियों, समाज प्रमुखों, स्वयंसेवी संगठनों, महिला समूहों, युवा संगठनों, शासकीय विभागों, गैर-शासकीय संस्थानों एवं आमजनों की सक्रिय भागीदारी निर्धारित की गई है. शासन और समाज की सहभागिता से बाल विवाह के विरुद्ध व्यापक जन समर्थन से आगामी 3 सालों में पूरे प्रदेश को बाल विवाह से मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित है.
भारत में बाल विवाह का इतिहास : भारत में बाल विवाह का इतिहास काफी पुराना है. इसे रोकने के लिए साल 1929 में शारदा अधिनियम बना.जिसे आगे चलकर बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के माध्यम से कानूनी तौर पर प्रतिबंधित किया गया.इस कानून के अनुसार महिला की आयु 18 वर्ष और पुरुष की 21 वर्ष से कम होने पर विवाह को बाल विवाह माना जाता है.

इसके अलावा भी भारत में बाल विवाह को रोकने के लिए कई तरह के प्रावधान किए गए हैं.
| 'बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA), 2006' का प्रवर्तन | यह 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों और 21 वर्ष से कम उम्र के लड़कों के विवाह पर प्रतिबंध लगाता है. इस अधिनियम की धारा 16 राज्य सरकार को बाल विवाह निषेध अधिकारी (CMPO) नियुक्त करने के लिए अधिकृत करती है. |
| किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 | इसमें उन बच्चों की देखभाल और सुरक्षा के प्रावधान किए गए हैं, जिनकी विवाह की उम्र होने से पहले ही विवाह करा दिए जाने का खतरा है. |
| बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना (2015) | यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एक योजना है. इस योजना का उद्देश्य लैंगिक रूढ़िवादिता को तोड़ना और पुत्र-प्रधान रीति-रिवाजों को चुनौती देना है. इसमें बालिकाओं के जन्म पर उत्सव मनाने, सुकन्या समृद्धि खातों को बालिकाओं के जन्म से जोड़ने और बाल विवाह को रोकने के घटक शामिल हैं. |
| राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) | यह आयोग बाल विवाह के मुद्दे पर बाल कल्याण समितियों (CWC), पुलिस, महिला एवं बाल विकास विभाग और नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधियों जैसे हितधारकों के साथ विविध गतिविधियां संचालित करता है. |
| बाल विवाह को रोकने के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना | यह एक व्यापक रूपरेखा है, जिसका उद्देश्य उन लड़कियों को सहायता देना है, जिनका कम उम्र में विवाह होने का खतरा है. इसमें बेहतर डेटा संग्रह, जागरुकता कार्यक्रम और राज्य एवं स्थानीय सरकारों के बीच मजबूत समन्वय शामिल है. |
बाल विवाह के चौंकाने वाले आंकड़े : यूनिसेफ की रिपोर्ट की माने को अनुमानित तौर पर भारत में हर साल 18 साल से कम उम्र में करीब 15 लाख लड़कियों की शादी होती है. इसी वजह से भारत में दुनिया की सबसे अधिक बाल वधुओं की संख्या है.जो विश्व की कुल संख्या का तीसरा हिस्सा है. 15 से 19 साल की उम्र की लगभग 16 प्रतिशत लड़कियां शादीशुदा हैं.लेकिन सामाजिक जागरुकता के कारण इनमें कमी आई है. साल 2005-2006 से 2015-2016 के दौरान 18 साल से पहले शादी करने वाली लड़कियों की संख्या 47 प्रतिशत से घटकर 27 प्रतिशत रह गई थी. लेकिन ये आंकड़ें अब भी ज्यादा हैं.
क्यों आई गिरावट ? : भारत में बाल विवाह में तेजी से गिरावट होने का सबसे बड़ा हथियार शिक्षा है. बेटी पढ़ाओ बेटी बढ़ाओ जैसे अभियान ने बाल विवाह पर अंकुश लगाने का काम किया.जब बेटियों को बेटों के बराबर दर्जा मिलने लगा तो सोच विकसित हुई.उन्हें ये समझ आया कि समाज में जितना स्थान बेटे के लिए है,उतनी ही जगह बेटियों के लिए भी. बेटियां जब पढ़ने के लिए स्कूल जाने लगी तो उन्हें दुनिया के बारे में पता चला. उन्होंने देखा कि महिलाएं हर फील्ड में आगे हैं. वो काम जो सिर्फ पुरुष किया करते थे उनमें महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं. बेटियों ने शिक्षा के लिए शहरों की ओर पलायन भी किया. जिससे उन्हें सोचने की आजादी मिली. अब ना तो उनका और ना ही परिवार का ध्यान शादी की ओर गया.बल्कि एक निश्चित उम्र तक बेटियों को पढ़ाने में समाज ने जोर दिया. लड़कियों की शिक्षा में तेजी से बढ़ोतरी, नाबालिग लड़कियों के लिए सरकार की योजनाएं और बाल विवाह का गैर कानूनी होने और इसके नुकसान पर सशक्त सार्वजनिक संदेश इस बदलाव के कारण हैं.
बाल विवाह देश के लिए चुनौती
-बाल विवाह के कारण किशोरियों में कुल प्रजनन क्षमता 17% से 26% तक बढ़ जाती है, जो कि देश की जनसंख्या पर एक अतिरिक्त दबाव है। (ग्लोबल सिंथेसिस रिपोर्ट, 2017)
-18 वर्ष से पहले 75 प्रतिशत किशोरियों के गर्भधारण की मुख्य वजह बाल विवाह है.(प्लान इंटरनेशनल सर्वे , 2020)
-बाल विवाह की समाप्ति से राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति आय और उत्पादकता में 1% की वृद्धि हो सकती है.(विश्व बैंक रिपोर्ट 2017)
-बाल विवाह का भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और यह गरीबी का एक वंशानुगत चक्र बना सकता है. (जेनिफर पार्सन्स एट अल. 2015)
-उच्च जनसंख्या बढ़ोतरी से जूझ रहे विकासशील देशों पर महिलाओं की कुल प्रजनन क्षमता में 17% की वृद्धि से नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिसका एक मुख्य कारण कम उम्र में अनचाहा गर्भ है. (विश्व जनसंख्या नीतियाँ - यूएन, 2021)
-बाल विवाह के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को जीडीपी का लगभग 1.68% का नुकसान होता है. (रिषा सिंह, 2017)
-बाल विवाह मानवाधिकारों का उल्लंघन है और लैंगिक असमानता का प्रतीक है.(फैन, एस., कोस्की, 2022)
विवाह की न्यूनतम आयु पर समितियों और सम्मेलनों की सिफारिशें
| समिति / सम्मेलन | अनुशंसित आयु | तर्क एवं अवलोकन |
| यूनिसेफ (2020) | पुरुष और महिला दोनों के लिए 18 | एक व्यक्ति 18 वर्ष की आयु में विवाह के लिए भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व होता है. |
| बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (2016) | पुरुष और महिला दोनों के लिए 18 | वयस्कता की आयु के बराबर होनी चाहिए. |
| संसदीय स्थायी समिति (2004 के विधेयक की जांच करते समय, जो बाद में 2006 का अधिनियम बन गया) | पुरुष के लिए 21, महिला के लिए 18 | देश में सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से दो अलग-अलग आयु को स्वीकार किया गया है. हालांकि, ये भी देखा गया है कि कानूनों में बच्चे की परस्पर विरोधी परिभाषा भ्रम, अस्पष्टता और संदेह पैदा कर सकती है. |
| भारतीय विधि आयोग | पुरुष और महिला दोनों के लिए 18 | उम्र अलग होने का कोई वैज्ञानिक कारण नहीं है (2008)वयस्कता की आयु सभी नागरिकों को अपनी सरकार चुनने का अधिकार देती है, विवाह की कानूनी आयु को भी इसी रूप में मान्यता दी जानी चाहिए (2018) |
स्रोत: संयुक्त राष्ट्र; कार्मिक, लोक शिकायत, विधि एवं न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति, भारतीय विधि आयोग की रिपोर्ट
Suggested Citation: Jejeebhoy, S.J. 2019. Ending Child Marriage in India, Drivers and Strategies.New Delhi: UNICEF
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