1500 नन्हें घड़ियालों की चंबल में दस्तक, वन विभाग की टीम संरक्षण में जुटी
राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में अंडों से नन्हें घड़ियाल निकल रहे हैं.

Published : June 19, 2025 at 10:38 AM IST
|Updated : June 19, 2025 at 11:15 AM IST
धौलपुर : राजस्थान-मध्य प्रदेश की सीमा से होकर गुजरने वाली चंबल नदी इन दिनों नन्हें घड़ियालों की किलकारियों से गुलजार हो रही है. गर्मी के मौसम में चंबल के रेतीले किनारों पर सुरक्षित रखे गए अंडों से अब बच्चे निकलने लगे हैं. राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य के अधिकारियों की देखरेख में इन अंडों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है.
मुरैना जिले के देवरी घड़ियाल पालन केंद्र में कृत्रिम हैचिंग की मदद से अंडों से बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाला जा रहा है. रेंजर दीपक कुमार मीणा के अनुसार, धौलपुर रेंज के शंकरपुरा, अंडवापुरैनी, हरिगिर बाबा और बसई डांग जैसे क्षेत्रों में हजारों अंडे दिए गए थे, जिनमें से अब तक करीब 1500 बच्चे निकल चुके हैं. इन नन्हे घड़ियालों की गतिविधियों से चंबल के घाटों पर जीवंतता लौट आई है. झुंड के झुंड बच्चे घाटों पर नजर आ रहे हैं, जिन्हें देखकर अभयारण्य अधिकारियों के चेहरे भी खिल उठे हैं. बताया गया कि मादा घड़ियाल बच्चों की देखरेख खुद कर रही है, जबकि सुरक्षाकर्मी भी लगातार निगरानी में लगे हुए हैं.
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देवरी केंद्र में कृत्रिम हैचिंग की प्रक्रिया : देवरी घड़ियाल पालन केंद्र के प्रभारी ज्योति डंडोतिया ने जानकारी दी कि हर वर्ष 15 से 19 मई के बीच चंबल की नेस्टिंग साइट्स से 200 अंडे लाकर कृत्रिम हैचरी में रखे जाते हैं. यहां एक विशेष चैम्बर में 30 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान बनाकर रखा जाता है. इस वर्ष 195 अंडों से सफलतापूर्वक घड़ियाल के बच्चे निकले हैं, जबकि 5 अंडे खराब हो गए.
नन्हें बच्चों की तरह होती है परवरिश : डंडोतिया ने बताया कि अंडों से बाहर आने के बाद घड़ियाल के बच्चों को 15 दिन तक क्वारंटीन में रखा जाता है. इस दौरान उन्हें केमिकल स्नान कराकर संक्रमण से बचाया जाता है. पहले 15 दिन तक उन्हें भोजन नहीं देना पड़ता, क्योंकि वे योक से मिले पोषण पर ही जीवित रहते हैं. लंबाई 1.2 मीटर तक पहुंचने पर बच्चों को चंबल नदी में छोड़ा जाता है. जब तक यह माप नहीं होती, उन्हें पालन केंद्र में ही रखा जाता है.
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घड़ियालों की जीवन यात्रा में जोखिम भी कम नहीं : जानकारों के अनुसार, चंबल की मुख्यधारा का तेज बहाव, बारिश के मौसम में जलस्तर का अचानक बढ़ना, बाज, कौवे, मगरमच्छ जैसे मांसाहारी जीव ये सभी नन्हे घड़ियालों के लिए बड़े खतरे हैं. एक अनुमान के अनुसार केवल 1-2% बच्चे ही प्राकृतिक परिस्थिति में जीवित रह पाते हैं. चंबल नदी की स्वच्छता और प्राकृतिक जैवविविधता का संरक्षण इसके जलीय जीवन के लिए वरदान साबित हो रहा है. अभयारण्य अधिकारियों के अनुसार, वर्तमान में चंबल में करीब 1000 मगरमच्छ, 95 डॉल्फिन, सैकड़ों कछुए और अन्य जलजीव निवास कर रहे हैं. भारत सरकार ने वर्ष 1978 में चंबल नदी के 435 किलोमीटर क्षेत्र को राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य घोषित किया था. इससे पूर्व, 1975-77 के अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण में चंबल में मात्र 46 घड़ियाल देखे गए थे, जिनकी संख्या अब सैकड़ों में पहुंच चुकी है.


