अफगानिस्तान को भारत क्या मान्यता देगा, काबुल की नीतियों का क्या समर्थन करेगा इंडिया
अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मुत्तकी की भारत यात्रा अनूठी यात्रा है. तालिबान के साथ भारत के क्रमिक जुड़ाव की प्रक्रिया का ये चरमोत्कर्ष है.

Published : October 14, 2025 at 2:03 PM IST
हैदराबाद: अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मौलवी अमीर खान मुत्तकी की भारत यात्रा अपनी तरह की एक अनूठी यात्रा है. तालिबान के साथ भारत के क्रमिक जुड़ाव की प्रक्रिया का ये चरमोत्कर्ष है. यह प्रक्रिया कम से कम जून 2022 से विभिन्न माध्यमों से चल रही है. यह यात्रा इस मायने में अनूठी है कि विदेश मंत्री स्तर के एक तालिबान नेता को नई दिल्ली में अपने भारतीय समकक्ष के साथ बातचीत के लिए आमंत्रित किया गया था.
वहीं भारत ने, अधिकतर वैश्विक शक्तियों की तरह, अभी तक अफगानिस्तान में तालिबान के नेतृत्व वाली सरकार को राजनयिक मान्यता नहीं दी है.

संक्षिप्त पृष्ठभूमि: तालिबान को एक अति-कट्टरपंथी इस्लामी संगठन माना जाता है. इस पर संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिबंध लगा रखा है. 1989 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान से हटने के बाद, अफगानिस्तान में गृहयुद्ध के दौरान, यह पहली बार 1996 में सत्ता में आया था.
बाद में, 2001 में अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा सैन्य हस्तक्षेप के कारण तालिबान को सत्ता से बाहर कर दिया गया. अमेरिका ने तालिबान पर अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड टावर्स और पेंटागन पर हुए 9/11 के सबसे घातक आतंकवादी हमलों के मास्टरमाइंडों को पनाह देने का आरोप लगाया था.
तालिबान शासन के खदेड़ दिए जाने के बाद अफगानिस्तान में एक लोकतांत्रिक सरकार स्थापित हुई. इस सरकार को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का समर्थन प्राप्त था. अगले दो दशकों तक अमेरिका ने अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ एक अनिर्णायक युद्ध लड़ा.
अंततः अमेरिका ने अफगानिस्तान से हटने का फैसला लिया और इस उद्देश्य से 2020 में तालिबान के साथ इस शर्त पर वापसी का समझौता किया कि तालिबान अमेरिका और उसके सहयोगियों को निशाना नहीं बनाएगा.
अफगान समाज के विभिन्न राजनीतिक वर्गों के प्रतिनिधियों वाली एक समावेशी सरकार के अफगानिस्तान में अंतर-अफगान वार्ता और परामर्श के माध्यम से बनने की उम्मीद थी, जो शुरू तो हुई, लेकिन टूट गई. 15 अगस्त 2021 को, सशस्त्र तालिबान बिना किसी बड़े प्रतिरोध का सामना किए, काबुल में घुस आए. इसके बाद अफगान सरकार गिर गई और तालिबान शासन 2.0 ने देश पर नियंत्रण कर लिया. उसके बाद से तालिबान ने देश पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया है. हालांकि आतंकवादी संगठन ISIS(K) तालिबान शासन के लिए कुछ चुनौतियां पेश करता है.

बीते 4 वर्षों में, तालिबान 2.0 को शुरुआती दौर में जिस अंतरराष्ट्रीय अलगाव का सामना करना पड़ा था, उसमें कुछ कमी आई है. रूस ने जहां तालिबान को राजनयिक मान्यता प्रदान की है. वहीं चीन सहित कई अन्य देश विभिन्न स्तरों पर तालिबान के साथ बातचीत कर रहे हैं.
वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए, तालिबान और भारत दोनों के एक-दूसरे के साथ बातचीत करने के अपने-अपने कारण हैं. शुरुआत से ही तालिबान ने भारत से संपर्क करने के स्पष्ट प्रयास किए और भारत को आश्वस्त किया कि भारत का 3 अरब डॉलर से अधिक का निवेश (2001-2021 के बीच किया गया) सुरक्षित है और अधूरी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए भारत का स्वागत है.
अफगानिस्तान के दृष्टिकोण से, भारत के साथ बातचीत अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में मददगार हो सकती है. इसके अलावा, भारत के साथ प्रत्यक्ष बातचीत तालिबान की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति/मान्यता प्राप्त करने की व्यापक रणनीति का एक हिस्सा थी.
तालिबान 2.0 के साथ भारत की क्रमिक बातचीत की नीति को कई कारकों ने प्रभावित किया है. मुख्यतः यह रणनीतिक व्यावहारिकता और जमीनी हकीकतों पर आधारित सुरक्षा संबंधी विचारों से प्रेरित है. भारत के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल या दुरुपयोग भारत के राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल ताकतों द्वारा न किया जाए.
2021 में, आईएसआई/पाक सेना और तालिबान के बीच घनिष्ठता के कारण, पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान की धरती पर भारत-विरोधी आतंकवादी संगठन स्थापित करने की संभावना वास्तविक थी. इसके अलावा, भारत चुपचाप बैठकर अफगानिस्तान में चीन के प्रभाव को बढ़ता हुआ देखने का जोखिम नहीं उठा सकता. चीन तालिबान के साथ राजदूतों का आदान-प्रदान करने वाली पहली प्रमुख शक्ति थी.
अफगान विदेश मंत्री की नई दिल्ली की आधिकारिक यात्रा से पहले कई अन्य कदम उठाए गए. उदाहरण के लिए, 31 अगस्त 2021 को दोहा में भारतीय राजदूत और अफगानिस्तान के राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख स्टेनकजई के बीच हुई बैठक ने भारत और तालिबान के बीच राजनयिक संबंधों के द्वार खोल दिए.
जून 2022 में विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल की काबुल यात्रा के बाद, भारत की विकास सहायता और मानवीय सहायता परियोजनाओं की निगरानी के लिए भारतीय दूतावास में एक "तकनीकी टीम" की तैनाती की गई.
इस बीच, अफगानिस्तान में प्राकृतिक आपदाओं के समय भारत ने प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता के रूप में कार्य करना जारी रखा. विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने जनवरी 2025 की शुरुआत में दुबई में अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी अमीर खान मुत्ताकी से मुलाकात की. अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से यह काबुल में तालिबान शासन के साथ भारत का सर्वोच्च स्तर का आधिकारिक संपर्क था.
पाकिस्तान का पहलू: 2021 में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध पिछले कुछ वर्षों में काफी तनावपूर्ण रहे हैं. अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच डूरंड रेखा, जो दोनों देशों के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा है, को लेकर मतभेद जारी हैं. पाकिस्तान द्वारा अफगान शरणार्थियों का जबरन निर्वासन एक और विवादास्पद मुद्दा है.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान पर अफगान-विरोधी आतंकवादी संगठन ISIS(K) को पनाह देने का आरोप लगाता है, जबकि पाकिस्तान, अफगानिस्तान पर TTP (पाकिस्तान) को पनाह देने का आरोप लगाता है.
इससे आतंकवादी हमले हाल के वर्षों में पाकिस्तान पर कई गुना बढ़ गए हैं. बढ़ते तनाव के कारण दोनों देशों के बीच गंभीर सीमा संघर्ष हुए हैं. अफगान-पाकिस्तान संबंधों में गिरावट भारत के लिए अपने फायदे के लिए रणनीतिक रूप से उपयुक्त जगह बनाती है.
यात्रा से महत्वपूर्ण निष्कर्ष: अफगानिस्तान की ओर से यह उच्च-स्तरीय यात्रा इस बात की पुष्टि है कि भारत की "अफगानिस्तान के साथ सतर्क जुड़ाव" की प्रारंभिक नीति अब "रणनीतिक व्यावहारिकता" के एक नए चरण में प्रवेश कर गई है.
इस यात्रा ने द्विपक्षीय राजनीतिक आदान-प्रदान और अफगानिस्तान में बुनियादी ढांचे के विकास एवं क्षमता निर्माण के लिए भारत द्वारा की गई बढ़ी हुई विकास सहायता के माध्यम से द्विपक्षीय संबंधों को अगले स्तर तक ले जाने के भारत के निर्णय और अफगानिस्तान की इच्छा का भी संकेत दिया है.
दोनों पक्षों ने सीमा पार आतंकवाद पर अपने विचारों में समानता दोहराई है. पाकिस्तान का नाम लिए बिना, "दोनों पक्षों ने क्षेत्रीय देशों से उत्पन्न सभी आतंकवादी कृत्यों की स्पष्ट रूप से निंदा की." अफगान विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से "यह प्रतिबद्धता दोहराई कि अफगान सरकार किसी भी समूह या व्यक्ति को भारत के विरुद्ध अफगानिस्तान की भूमि का उपयोग करने की अनुमति नहीं देगी."
इस समय भारत के सामने दो महत्वपूर्ण मुद्दे हैं. पहला, अफगानिस्तान में तालिबान शासन को पूर्ण राजनयिक मान्यता प्रदान करना. ऐसा प्रतीत होता है कि भारत इस मुद्दे पर अपने निर्णय को अंतर्राष्ट्रीय राय के साथ समन्वयित करने के लिए फिलहाल प्रतीक्षा करेगा.
भारत के लिए दूसरी चुनौती कूटनीति और सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाने के तरीके खोजना है. खासकर यह देखते हुए कि तालिबान प्रतिगामी नीतियों पर काम कर रहा है. खासकर महिलाओं के अधिकारों और स्वतंत्रता के मामले में.
भू-राजनीति में, व्यावहारिकता समायोजन की मांग करती है और शायद इसी वजह से भारत हाल ही में अफगानिस्तान में एक ऐसी समावेशी सरकार के गठन की मांग को लेकर मुखर नहीं रहा है, जिसमें सभी जातीय समुदायों के साथ-साथ महिलाओं का भी प्रतिनिधित्व हो.
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