सूरज की रोशनी को सीधे बायोफ्यूल में बदलेगी ये तकनीक, सागर यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर को मिला पेटेंट
मध्य प्रदेश की सेंट्रल यूनिवर्सिटी सागर के क्रिमिनोलॉजी डिपार्टमेंट की प्रोफेसर की डिवाइस को मिला पेटेंट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : September 25, 2025 at 7:48 PM IST
सागर: वैसे सामान्य तौर पर लोग इसे काई बोलते हैं, लेकिन विज्ञान की नजर से इनके कई प्रकार होते हैं. इसी तरह सूक्ष्म शैवाल होती हैं, जिसे डाइएटम नाम से जाना जाता है. इससे सूरज की रोशनी की मदद से बाॅयोफ्यूल बनाया जा सकता है. इसी तकनीक को सागर यूनिवर्सिटी की क्रिमिनोलॉजी एंड फोरेंसिक सांइस डिपार्टमेंट की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ वंदना विनायक ने ईजाद किया है. जिसका उन्हें पेटेंट मिल चुका है. नवकरणीय ऊर्जा की दिशा में ये बड़ी खोज है.
खास बात ये है कि महासागर से जो तेल निकाला जाता है, वो 30 फीसदी डाइएटम से ही निकाला जाता है. लेकिन इसकी लागत काफी ज्यादा है. ऐसे में इस नई तकनीक से डाइएटम (Diatoms) को खत्म किए बिना लगातार बाॅयोफ्यूल निकाला जा सकेगा. खास बात ये है कि जीवाश्व ईधन के विकल्प के रूप में बाॅयोफ्यूल के तौर पर डायाफ्यूल (Diafuel) का उपयोग कर सकते हैं. इसके अलावा उद्योगों और अंतरिक्ष अभियान के लिए ये ऊर्जा का बेहतर स्त्रोत हो सकता है.
बाॅयोफ्यूल उत्पादन की नवीन तकनीक
क्रिमिनोलॉजी एंड फोरेंसिक सांइस डिपार्टमेंट की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ वंदना विनायक को जो पेटेंट मिला है, यह पेटेंट एक ऐसी नवीन तकनीक है. जहां सौलर पैनल और डाइएटम को जोड़कर ऐसा उपकरण तैयार किया गया है, जो सूरज की रोशनी से सीधे बायोफ्यूल (डायाफ्यूल) उत्पन्न करता है. ये तकनीक डाइएटम नामक सूक्ष्म शैवाल (microalgae) पर आधारित है. जिनकी कोशिका भित्ति में प्राकृतिक नैनो-आर्किटेक्चर होता है. इनकी यही खास संरचना इन्हें ऊर्जा उत्पादन और बायोफ्यूल बनाने में अत्यंत उपयोगी बनाती है. इस आविष्कार में एक डाइएटम सोलर पैनल बनाया गया है, जो सौर ऊर्जा की मदद से डाइएटम से डायाफ्यूल (Diafuel) यानी बायोफ्यूल उत्पन्न करता है.
डाइएटम सोलर पैनल की संरचना
इस आविष्कार में सोलर पैनल पर विशेष तरीके से डाइएटम को व्यवस्थित (immobilize) किया गया है. दरअसल सोलर पैनल पर पड़ने वाली सूर्य की किरणें डाइएटम की नैनो-आर्किटेक्चर से होकर गुजरती हैं और उन्हें सक्रिय करती हैं. जिससे डाइएटम अपने अंदर संग्रहित तेल या बायोफ्यूल जैसे अणु बाहर निकालता है. निकले हुए तेल को नैनो स्पांज की मदद से को इकट्ठा किया जाता है. इसे आगे जाकर बायोफ्यूल में बदलकर पर्यावरण अनुकूल और नवीकरणीय ऊर्जा के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है. इस तकनीक की खास बात ये है कि इस तकनीक के उपयोग से डाइएटम जीवित रहते हैं और उनका उपयोग बार-बार किया जा सकता है.

तकनीक की विशेषताएं
दरअसल महासागर से डाइएटम से तेल निकालने के लिए अब तक जो तकनीक है. वह काफी महंगी है और उनके उपयोग से डाइएटम को नुकसान होता है. लेकिन इस तकनीक में पारंपरिक बायोफ्यूल तकनीक से अलग डाइएटम को मारे बिना तेल निकाला जा सकता है. नैनो आर्किटेक्चर आधारित सोलर पैनल उनकी क्षमता को और बढ़ाता है. यह तरीका सतत पर्यावरण-अनुकूल और काफी सस्ता हो सकता है.

डायाफ्यूल की उपयोगिता
इस तकनीक से ईजाद डायाफ्यूल यानि की बाॅयोफ्यूल से हरित ऊर्जा का उत्पादन होता है. ये जीवाश्म ईधन (fossil fuels) का बेहतर विकल्प है. इसके अलावा इसके जरिए औद्योगिक उपयोग के लिए औद्योगिक बायोफ्यूल का निर्माण किया जा सकता है. इसके अलावा अंतरिक्ष अभियानों में ऊर्जा स्रोत के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है.

'डाइएटम सोलर पैनल से मिलेगा बाॅयोफ्यूल'
डाॅ वंदना विनायक बताती हैं कि "हमारे प्रोजेक्ट का लक्ष्य डाइएटम सोलर पैनल बनाने का था. सोलर पैनल के जरिए बिजली उत्पादन की जाती है लेकिन इस डाइएटम सोलर पैनल से हमें बाॅयोफ्यूल मिलेगा. जैसा कि सब जानते हैं कि पेट्रोल,डीजल जैसे उर्जा के स्त्रोत काफी महंगे हैं लेकिन नवकरणीय उर्जा की बात करें, तो डाइएटम एक तरह की काई है, जिसमें बहुत अधिक मात्रा में तेल रहता है.
महासागर से जो तेल निकाला जाता है, वो 30 फीसदी डाइएटम से निकाला जाता है लेकिन इसमें सबसे बडी दिक्कत ये है कि इसकी लागत बहुत ज्यादा है. क्योकिं डाइएटम की जो ऊपरी परत है, वो सिलिका की है और काफी ज्यादा कठोर है. उसको कुचलकर कर ऑयल निकालने का मतलब डाइएटम (Diatoms) को खत्म करना है. साथ ही इसकी लागत भी काफी ज्यादा होती है. ऐसे में हमनें 2 इंच के डिवाइस पर एक उपकरण बनाया है."
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'प्रोजेक्ट के तहत बनाई थी डिवाइस'
डाॅ वंदना विनायक बताती हैं कि "हमारे पास एक Indian Nanoelectronics Users Program और Indian Institute of Technology Bombay का एक प्रोजेक्ट था, जो मुझे स्वीकृत हुआ था. इस प्रोजेक्ट के तहत हमने ये डिवाइस बनाई थी, जिसे बाद में हमने अपग्रेड कर दिया. ये सोलर एनर्जी से चलता है और इसमें कुछ पिलर्स होते हैं, जो एक दूसरे को mechanical Shear Force देते हैं.
जिससे डाइएटम की ऊपरी परत पर दबाव बनता है और इससे ऑयल बाहर की तरफ निकलता है और डाइएटम (Diatoms) खत्म नहीं होता है. इसके कारण लगातार हमें ऑयल मिलता रहता है. हमने यहां पर डायाफ्यूल शब्द का उपयोग किया है, जिसका मतलब डाइएटम से मिलने वाला बाॅयोफ्यूल है. फिर इस नैनो ऑयल को इकट्ठा करने के लिए हम नैनो स्पांज (nano sponge) का उपयोग करते हैं. इसके जरिए हम तेल को सोख भी सकते हैं और निकाल भी सकते हैं."

