पितृ ऋण से उऋण होने का पर्व पितृपक्ष मेला आज से शुरू, इस बार इतने दिनों का होगा श्राद्ध-पक्ष
17 नहीं इस बार इतने दिन का होगा गया का विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला, पिंडदान-श्राद्ध से पूर्वजों को मोक्ष की कामना होगी.


Published : September 6, 2025 at 7:52 AM IST
|Updated : September 6, 2025 at 11:04 AM IST
गया : बिहार में गया जी की धरती एक बार फिर पितरों की याद में आस्था के सैलाब से भरने वाली है. इस साल पितृपक्ष मेला आज से शुरू होकर 21 सितंबर तक चलेगा. खास बात यह है कि आश्विन कृष्ण षष्ठी और सप्तमी का श्राद्ध एक ही दिन पड़ने के कारण यह मेला 17 नहीं बल्कि 16 दिनों का होगा.
पितृ ऋण से उऋण होने का पर्व : पितृपक्ष को पितृ ऋण से उऋण होने का पर्व माना जाता है. मान्यता है कि इस दौरान पिंडदान करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है. गया जी इसी वजह से मोक्ष नगरी के नाम से विख्यात है.
इस बार 16 दिन का होगा मेला : आश्विन कृष्ण षष्ठी और सप्तमी का श्राद्ध 13 सितंबर को एक ही तिथि में पड़ रहा है. यही कारण है कि इस बार पितृपक्ष मेला 16 दिनों का होगा. यह 6 सितंबर से शुरू होकर 21 सितंबर तक चलेगा.
श्राद्ध की तिथियां तय : 6 सितंबर को भाद्र शुक्ल चतुर्दशी से मेला शुरू होगा और 21 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा. इन दिनों में प्रतिदिन अलग-अलग तीर्थस्थलों पर पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण की परंपरा निभाई जाएगी.
| तिथि (2025) | वार | श्राद्ध | प्रमुख पिंडदान/श्राद्ध स्थल |
|---|---|---|---|
| 6 सितंबर | शनिवार | भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी | पुनपुन तट पर श्राद्ध |
| 7 सितंबर | रविवार | भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा (पूर्णिमा श्राद्ध) | फल्गु नदी स्नान, खीर के पिंड से श्राद्ध |
| 8 सितंबर | सोमवार | आश्विन कृष्ण प्रतिपदा श्राद्ध | ब्रह्म कुंड, प्रेत शिला, राम कुंड, रामशिला, काकबली |
| 9 सितंबर | मंगलवार | आश्विन कृष्ण द्वितीया | उत्तर मानस उदिची, कनखल, दक्षिण मानस, जिह्वालोल वेदियां |
| 10 सितंबर | बुधवार | आश्विन कृष्ण तृतीया श्राद्ध | सरस्वती स्नान, मातंग वापी, धर्मारण्य |
| 11 सितंबर | गुरुवार | आश्विन कृष्ण चतुर्थी श्राद्ध | ब्रह्म सरोवर, आम्र सिंचन, काकबली |
| 12 सितंबर | शुक्रवार | आश्विन कृष्ण पंचमी श्राद्ध | विष्णुपद मंदिर में रुद्र पद, ब्रह्म पद और विष्णु पद पर खीर पिंड से श्राद्ध |
| 13 सितंबर | शनिवार | आश्विन कृष्ण षष्ठी व सप्तमी श्राद्ध (एक ही दिन) | विष्णुपद मंदिर के 16 वेदी मंडप व पास के मंडप में पिंडदान |
| 14 सितंबर | रविवार | आश्विन कृष्ण अष्टमी श्राद्ध | विष्णुपद मंदिर के 16 वेदी नामक मंडप में पिंडदान |
| 15 सितंबर | सोमवार | आश्विन कृष्ण नवमी श्राद्ध | राम गया में श्राद्ध, सीता कुंड पर माता-पिता-पितामही को बालू के पिंड |
| 16 सितंबर | मंगलवार | आश्विन कृष्ण दशमी श्राद्ध | गयासिर गया कूप के पास पिंडदान |
| 17 सितंबर | बुधवार | आश्विन कृष्ण एकादशी श्राद्ध | मुंड पृष्ठा, आदि गया, धौत पद (खोवा या तिल-गुड़ पिंडदान) |
| 18 सितंबर | गुरुवार | आश्विन कृष्ण द्वादशी श्राद्ध | भीम गया, गो प्रचार, गदा लोल |
| 19 सितंबर | शुक्रवार | आश्विन कृष्ण त्रयोदशी श्राद्ध | फल्गु स्नान, दूध का तर्पण, गायत्री-सावित्री-सरस्वती तीर्थ पर प्रातः, मध्यान्ह, सायं स्नान |
| 20 सितंबर | शनिवार | आश्विन कृष्ण चतुर्दशी श्राद्ध | वैतरणी स्नान और तर्पण |
| 21 सितंबर | रविवार | आश्विन कृष्ण सर्वपितृ अमावस्या | अक्षयवट के नीचे श्राद्ध और ब्राह्मण भोज, गयापाल पंडा द्वारा विदाई |
कहां और कैसे होता है पिंडदान : पितृपक्ष में पुनपुन तट, फल्गु नदी, ब्रह्म कुंड, प्रेत शिला, रामशिला, सीता कुंड, विष्णुपद मंदिर समेत कई पवित्र स्थलों पर पिंडदान किया जाता है. हर दिन अलग-अलग वेदियों और कुंडों पर आचार्यों के निर्देशन में पिंडदान और तर्पण का विधान है.

15 लाख से अधिक तीर्थयात्रियों की उम्मीद : इस बार पितृपक्ष मेले में 15 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है. देश ही नहीं, विदेशों से भी पिंडदानी अपने पूर्वजों के मोक्ष की कामना को लेकर यहां पहुंचते हैं.
पितरों के झूमने की मान्यता : मान्यता है कि जैसे ही पितृपक्ष मेला शुरू होता है, पितर गया जी में पहुंच जाते हैं. अपने वंशज को देखकर वे प्रसन्न होकर झूमने लगते हैं. यही वजह है कि इस पखवाड़े को मोक्ष का सबसे बड़ा अवसर माना जाता है.

''पितृ पक्ष मेला शुरू होते ही गया जी को पितर पहुंच जाते हैं और अपने वंशज का इंतजार करते हैं. अपने वंशज के कदम रखते ही पितर झूमने लगते हैं.'' – राजा आचार्य, रामाचार्य मंत्रालय वैदिक पाठशाला, गयाजी
धरोहर है यह परंपरा : गया जी का पितृपक्ष मेला न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि सदियों पुरानी परंपरा को भी जीवित रखता है. यहां पीढ़ियों से लोग पिंडदान करने आते रहे हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी यह परंपरा एक धरोहर बन चुकी है.
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