ETV Bharat / bharat

NDA को 2010 में 24, 2020 में सिर्फ 6 सीट, मगध की 26 सीटों पर 2025 का पूरा समीकरण समझिए

2010 में मगध की 26 में 24 सीटें जीतने वाला एनडीए, 2020 में 6 पर सिमट गया, 2025 में सियासी चुनौती और बड़ी है-

BIHAR ELECTION 2025
बिहार में मगध का गढ़ बचाने चुनौती (ETV Bharat)
author img

By ETV Bharat Bihar Team

Published : August 28, 2025 at 8:09 PM IST

7 Min Read
Choose ETV Bharat

गया : गयाजी धार्मिक राजधानी के रूप में प्रसिद्ध है, लेकिन बिहार की राजनीति में भी इसका खास स्थान है. यही कारण है कि गयाजी सभी दलों के लिए बैटलफील्ड बना हुआ है. नेताओं की नजरें गयाजी पर टिकी हैं. गया जिले में भले ही 10 विधानसभा सीटें हैं, लेकिन फिर भी गयाजी का महत्व सबसे ज्यादा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा से लेकर राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा तक गया में निकल चुकी है.

गयाजी के सहारे 26 सीटों पर नजर : मगध क्षेत्र की राजनीति पर नजर रखने वालों का मानना है कि बिहार की सत्ता तक पहुंचने के लिए मगध की 26 सीटों पर जीत बेहद जरूरी है. यही वजह है कि दोनों गठबंधन के नेता मगध प्रमंडल पर फोकस कर रहे हैं. कभी एनडीए का गढ़ रहा मगध पिछले दो विधानसभा चुनावों से एनडीए के लिए कमजोर साबित हुआ है. इस बार एनडीए को फिर से पकड़ मजबूत करने की चुनौती है, जबकि महागठबंधन लगातार तीसरी बार दबदबा बनाए रखने की कोशिश में है.

ईटीवी भारत GFX.
ईटीवी भारत GFX. (ETV Bharat)

दोनों गठबंधन के लिए क्यों जरूरी है गया : मगध प्रमंडल में गया, जहानाबाद, औरंगाबाद, नवादा और अरवल जिले हैं. प्रमंडल का मुख्यालय गयाजी ही है. राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि मगध की 26 सीटों के लिए चुनावी रणनीति गयाजी से ही तैयार होती है. यही कारण है कि बड़े नेताओं की सभाएं अधिकतर गयाजी में होती हैं. कहा जाता है कि मगध की राजनीति की हवा का रुख गयाजी से तय होता है.

पिछली बार मांझी नहीं रहे कारगर : एनडीए के लिए मगध की राजनीति का बड़ा चेहरा पूर्व मुख्यमंत्री और हम पार्टी के संरक्षक जीतन राम मांझी हैं. उनका संबंध गयाजी से है. वे एनडीए के बड़े नेता हैं और उनकी पार्टी सहयोगी दल के रूप में है. ऐसे में एनडीए के लिए मगध जीतना जरूरी है. हालांकि 2020 के चुनाव में जीतन राम मांझी की पार्टी को एनडीए का फायदा मिला, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मांझी असरदार नहीं रहे. मगध की 6 सुरक्षित सीटों में इमामगंज और बाराचट्टी को छोड़ अन्य पर एनडीए को हार मिली.

ईटीवी भारत GFX.
ईटीवी भारत GFX. (ETV Bharat)

''पिछली बार एनडीए में कॉर्डिनेशन की कमी थी. चिराग पासवान ने अलग चुनाव लड़ा था, जिससे एनडीए को नुकसान हुआ. मांझी का चेहरा तब भी बड़ा था और अब भी है. इस बार विकास की राजनीति हावी होगी.''- इंजीनियर नंदलाल मांझी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, हम

गया में बराबरी की टक्कर : गया जिले की कुल 10 सीटों में 2020 में भाजपा ने गया टाउन और वजीरगंज जीता. हम पार्टी ने इमामगंज, बाराचट्टी और टेकारी पर कब्जा किया. राजद ने शेरघाटी, गुरुआ, बोधगया, बेलागंज और अतरी जीता. जदयू का खाता नहीं खुला, लेकिन 2024 उपचुनाव में बेलागंज से जीतकर जदयू ने वापसी की. फिलहाल गया में एनडीए 10 में 6 सीटों पर काबिज है.

ईटीवी भारत GFX.
ईटीवी भारत GFX. (ETV Bharat)

मगध है सत्ता की कुर्सी का पहिया : गयाजी और मगध का वोट जिस दल को मिलता है, बिहार की सियासत उसी रंग में रंग जाती है. बिहार की सत्ता का एक पैर मगध प्रमंडल माना जाता है. फिलहाल मगध क्षेत्र की 26 विधानसभा सीट में 19 महागठबंधन के पास हैं. गया में 4, अरवल में 2, जहानाबाद में 3, औरंगाबाद में 6 और नवादा में 4 सीटें महागठबंधन के पास हैं.

2020 में एनडीए का बुरा हाल : 2020 के चुनाव में मगध में एनडीए सिर्फ 6 सीटों तक सिमट गया था. बाद में उपचुनाव से एनडीए की एक और सीट बढ़ी और यह 7 हो गई. गया जिले में भाजपा 2, हम 3, जदयू 1, राजद 4 सीटों पर है. अरवल में 2 सीटों पर राजद और सीपीआई, जहानाबाद में राजद 2 और माले 1 सीट पर, औरंगाबाद में राजद 4 और कांग्रेस 2 सीटों पर, नवादा में राजद 3, कांग्रेस 1 और भाजपा 1 सीट पर काबिज है.

ईटीवी भारत GFX.
2020 चुनाव में एनडीए का फैक्टर (ETV Bharat)

NDA कभी आगे तो कभी पीछे : 2010 में मगध की 26 में से 24 सीटें एनडीए ने जीती थीं. राजद को सिर्फ बेलागंज से जीत मिली थी. जदयू ने 16 और भाजपा ने 8 सीटें जीतीं. 2015 में महागठबंधन ने वापसी की. राजद को 10, जदयू को 6, कांग्रेस को 4 और भाजपा को सिर्फ 5 सीटें मिलीं. हम पार्टी को एक सीट पर जीत मिली.

जातीय समीकरण रहा बड़ा फैक्टर : मगध में जाति सबसे बड़ा फैक्टर है. 2015 में महागठबंधन को MY समीकरण और पिछड़ा-अति पिछड़ा वोट का साथ मिला. 2020 में भी यही समीकरण रहा. जिसका फायदा सीधे तौर पर महागठबंधन को हुआ और 20 सीटें पानें में कामयाब रही. ये और बात है कि उपचुनाव में बेलागंज जीतकर जेडीयू ने अपनी मंशा जता दी है.

मगध पिछड़ी राजनीति का गढ़ : वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल कादिर कहते हैं कि मगध का क्षेत्र बिहार की सत्ता के लिए निर्णायक है. पीएम मोदी भी गयाजी को साधने में जुटे हैं. चुनाव से पहले वह यहां एक और दौरा करेंगे. अब्दुल कादिर कहते हैं कि मगध में बैकवर्ड-फॉरवर्ड की राजनीति गहरी है. भाजपा का यहां कभी मजबूत जनाधार नहीं रहा. 2010 में मिली बड़ी जीत भी जदयू के सहारे थी.

''उत्तरी बिहार से मगध का इलाका अलग है , यहां बैकवर्ड फॉरवर्ड का मामला अधिक होता है, अगड़ा पिछड़ा को लेकर मूवमेंट भी मगध में ज्यादा हुए हैं, विधानसभा के चुनाव में भाजपा का मगध में ज्यादा जनाधार नहीं रहा है, इसको 2010 के विधानसभा चुनाव से आकलन किया जा सकता है, 2010 में एनडीए ने मगध में सब से बड़ी जीत दर्ज की थी, लेकिन उस में भी 16 सीट पिछड़ों की राजनीति करने वाली जेडीयू ने 16 सीटें जीती थीं, इस से स्पष्ट है कि जाती समीकरण से अधिक बैकवर्ड राजनीति मगध में अब भी हावी है.’’- अब्दुल कादिर, वरिष्ठ पत्रकार

एनडीए के लिए मगध अब भी चुनौती : पूर्व एमएलसी संजीव श्याम सिंह का कहना है कि 2020 में हार की वजह एनडीए का बिखराव और लोजपा का अलग चुनाव लड़ना था. इस बार एनडीए एकजुट है और अल्पसंख्यक समुदाय का भरोसा नीतीश कुमार पर बढ़ा है. एनडीए को अपने विकास पर भरोसा ज्यादा है.

स्थानीय चेहरों की कमी बड़ी वजह : राजनीतिक विश्लेषक प्रसंजित चक्रवर्ती का कहना है कि एनडीए में जीतन राम मांझी के अलावा बड़ा पिछड़ा नेता नहीं है. महागठबंधन के पास कई स्थानीय नेता हैं. कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष भी मगध से आता है.

जन सुराज की चुनौती और नया समीकरण : 2025 के विधानसभा चुनाव में इस बार जन सुराज भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है. प्रशांत किशोर लगातार मगध में सक्रिय हैं और विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं. प्रशांत किशोर दोनों गठबंधन में थोड़ा-थोड़ा सेंध लगाते दिख रहे हैं. जन सुराज का दावा है कि वह जातीय नहीं, विकास की राजनीति कर रहा है. संयोजक जावेद खान का कहना है कि वे बिहारी समीकरण के सहारे मैदान में हैं.

ये भी पढ़ें-