होली का पेड़ सेमल जिससे जलती है सिर्फ होलिका, अंतिम संस्कार में फूल तक वर्जित
सदियों से मालवा में एक खास पेड़ की लकड़ियों से होता है होलिका दहन. इसकी लकड़ी को इतना अशुभ मानते हैं कि फर्नीचर तो दूर अंतिम संस्कार में भी नहीं होता इस्तेमाल.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : March 7, 2025 at 4:24 PM IST
|Updated : March 7, 2025 at 5:00 PM IST
मंदसौर (विनोद गौड़): होलाष्टक लगने के साथ ही पूरे देश में रंग-गुलालों की बौछारों से भरे फाग उत्सव की शुरूआत हो गई है. खरमास की शुरूआत के बाद इस पर्व का सबसे खास धार्मिक आयोजन होलिका दहन के रूप में होता है. होलिका दहन के लिए यूं तो सभी प्रकार के पेड़ों की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है. लेकिन मध्य प्रदेश के मालवा इलाके में होलिका दहन के लिए एक विशेष पेड़ की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि सदियों से इस पेड़ की लकड़ी का उपयोग किसी भी कार्य में नहीं किया जाता. लेकिन मालवा में इस पेड़ की लकड़ी का उपयोग होलिका दहन के लिए किया जाता है.
होलिका दहन में होता है इस पेड़ की लकड़ी का इस्तेमाल
प्रदेश के मालवा इलाके में होलिका दहन के लिए भी एक खास पेड़ का उपयोग होता है. इस पेड़ का नाम है सेमल का पेड़. इसका वानस्पतिक नाम बॉम्बैक्स(bombax) है. इसे कॉटन ट्री के नाम से भी जाना जाता है. खास बात ये है कि होली का पर्व आते ही इस पेड़ में आकर्षक लाल और मैरून कलर के फूल भी खिलने लगते हैं. इस पेड़ के पत्ते पतझड़ से पहले ही झड़ जाते हैं. होली के कुछ दिनों बाद यह पेड़ फिर से हरा-भरा होना शुरू हो जाता है. यही वह पेड़ है जिसे मालवा इलाके में 'होरी का पेड़' के रूप में पहचाना जाता है.
'पापरूपी वृक्ष के रूप में है पहचान'
ज्योतिषाचार्य पंडित शांतनु शास्त्री बताते हैं कि "मालवा में एक प्राचीन परंपरा है और इस परंपरा में पापरूपी वृक्ष की लकड़ियों का उपयोग होलिका दहन के लिए किया जाता है. इस पेड़ को सेमल के पेड़ के रूप में जाना जाता है. होलिका के प्रतीक के रूप में इस पेड़ की लकड़ियों का उपयोग किया जाता है. इस पेड़ में कांटे होते हैं. इस पेड़ की लकड़ी का उपयोग किसी भी काम में नहीं किया जाता है."

'अंतिम संस्कार में भी सेमल की लकड़ियों का उपयोग नहीं'
ज्योतिषाचार्य पंडित शांतनु शास्त्री बताते हैं कि "धार्मिक मान्यता के मुताबिक यह पेड़ केवल होली के दिन होलिका दहन करने के लिए ही काम में आता है. इस पेड़ की शाखाएं और लकड़ी ना तो इमारती लकड़ी के रूप में उपयोग होती है. इसे ना तो जलाने में उपयोग किया जाता है और ना ही इसका उपयोग फर्नीचर या कोई कृषि उपकरण बनाने में होता है.


इस पेड़ का उपयोग किसी भी शुभ काम में नहीं होता. इस पेड़ को इतना अशुभ माना जाता है कि इंसान की मृत्यु के पश्चात अंतिम संस्कार में भी इस पेड़ की लकड़ी का उपयोग नहीं किया जाता है. सदियों से मालवा इलाके में इसी पेड़ की लकड़ी से होलिका दहन करने की परंपरा चली आ रही है."

होलिका दहन में होता है सेमल की लकड़ी का उपयोग
ज्योतिषाचार्य पंडित शांतनु शास्त्री बताते हैं कि "होलाष्टक महोत्सव शुरू होने के बाद अब मालवा इलाके में हर एक गांव और शहर में होलिका के डंडे का रोपण शुरू होगा और चौपाल पर गाड़ी जाने वाली यह होलिका, होली पर्व की शाम और आधी रात के बीच जलाई जाएगी. होलिका दहन के लिए सेमल के पेड़ की लकड़ियों को काटकर चौपाल के बीच गाड़ा जाता है. इसके बाद दूसरी लकड़ियों के सहारे इसे जलाया जाता है. इस पेड़ लकड़ी इतनी गीली होती है कि होलिका दहन के रूप में इसके सहारे लगाई गई लकड़ियां जलकर राख हो जाती हैं फिर भी इस पेड़ की गीली लकड़ी नहीं जलती हैं."

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ज्योतिषाचार्य पंडित शांतनु शास्त्री बताते हैं कि "परंपरा के अनुसार जब इस पेड़ की गीली लकड़ी नहीं जलती है तो इसके अधजले डंडे को काटकर लोग नदी या बावड़ी में जाकर ठंडा करते हैं. जिसे होली ठंडा करने की प्रथा मानी जाती है. इस प्रथा में होलिका दहन के दूसरे दिन से ही घर की महिलाएं होली की आग ठंडी करने के लिए शीतला सप्तमी तक रोजाना दहन स्थल पर एक लोटा जल चढ़ाकर उसे ठंडा भी करती हैं. मालवा इलाके में यह धार्मिक परंपरा सदियों से चली आ रही है."

