बेलूर मठ की अनोखी परंपरा: यहां होती कुमारी पूजा, मां दुर्गा को लगाया जाता 'मछली' का भोग
कोलकाता के बेलूर मठ में दुर्गा पूजा के दौरान भोग, दीप, कमल और भक्तों के आंसुओं में मां जीवंत हो उठती हैं.


Published : September 30, 2025 at 5:33 PM IST
कोलकाताः बेलूर मठ में दुर्गा पूजा की शुरुआत स्वामी विवेकानंद ने 1901 में की थी. भिक्षु आमतौर पर वैदिक परंपरा के अनुसार पूजा नहीं करते. दुर्गा पूजा, संकल्प या कुमारी पूजा- ये केवल गृहस्थों के अनुष्ठान हैं, लेकिन स्वामी विवाकानंद ने इस परंपरा को तोड़ा. उन्होंने कहा, "जनता की सेवा ही ईश्वर की सेवा है." इसी विचार से बेलूर मठ में दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई.
पहली पूजा श्रीमां शारदा देवी की उपस्थिति में हुई थी. संकल्प भी उन्हीं के नाम पर हुआ था. उसी समय स्वामीजी ने कुमारी पूजा शुरू की. कन्याओं के चरणों में फूल, मिठाई और दक्षिणा अर्पित करना, वह परंपरा आज भी कायम है.
इस पूजा की एक और खासियत यहां लगाया जाने वाला भोग है. हर दिन भोग की दस प्लेटें चढ़ाई जाती हैं- आठ मांसाहारी, दो शाकाहारी. मां दुर्गा, कार्तिक, गणेश, नवपत्रिका, महिषासुर, महासिंह और उनकी सहचरियां लक्ष्मी और सरस्वती को भोग लगाया जाता है. नारायण और शिव के लिए शाकाहारी भोग लगाया जाता है.
महालया से ही चावल चुनना, सब्ज़ियां इकट्ठा करना और विशेष गोलियां लाना शुरू हो जाता है. सप्तमी से नवमी तक, सुबह के भोजन में खिचड़ी और साबुत हिल्सा मछली शामिल होता है. दोपहर में, चावल, पुलाव, पांच प्रकार के उबली और तली हुई सब्जी, विभिन्न करी, भेड़ का मांस- जो कालीघाट में चढ़ाई गई बलि से आता है, खाया जाता है.

सदियों पुरानी परंपराएंः
प्रतिदिन कम से कम पांच प्रकार की मछलियां खाई जाती हैं. रात में लूची, दाल, करी, मिठाई, खीर और रबड़ी. दशमी के दिन दधिकर्मा- दही, फल और मिठाई से बना एक चमत्कारी प्रसाद- चढ़ाया जाता है. इसके अलावा, महाअष्टमी की महासंधि पूजा भी होती है. इस वर्ष, शुद्ध पंचांग के अनुसार, यह बेलूर मठ में शाम 5:43 बजे से शाम 6:31 बजे तक होगी.
शास्त्रों के अनुसार, यह पूजा 48 मिनट तक चलती है, जिसमें अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के शुरुआती 24 मिनट शामिल हैं. ऐसी मान्यता है- "महाअष्टमी के दिन संधि पूजा के दौरान, मूल पराशक्ति देवी दुर्गा के रूप में प्रकट होती हैं. वह संधि पूजा के समय तब तक विद्यमान रहती हैं जब तक पृथ्वी सुई की नोक पर स्थिर रहती है."

फिर मठ का परिसर रोशनी से नहा उठता है. 108 कमल और 108 दीपक एक साथ जगमगा उठते हैं. कमल भक्ति का प्रतीक हैं और दीपक ज्ञान का. शंख और घंटियों की ध्वनि गूंजती है. ऐसा लगता है मानो मां आकाश से अवतरित हुई हों. चामुंडा रूप में वे महिषासुर, चंड और मुंड का वध कर रही हैं. मठ का हर इंच अग्नि की धधकती ज्वाला के समान चमक से भर जाता है.
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