ETV Bharat / bharat

वो किस्सा.. गर्वनर के अपमान पर खाई थी कसम, बेटे-बेटी को बनाएंगे 'लाट साहब' आज पूरा हुआ सपना

बिहार की दास फैमिली की कहानी दिलचस्प है. मोची का काम करने वाले पिता ने ठाना और परिवार के सभी बच्चों को अधिकारी बना डाला.

BIHAR Das Family
बिहार की दास फैमिली (ETV Bharat)
author img

By ETV Bharat Bihar Team

Published : June 20, 2025 at 7:55 PM IST

14 Min Read
Choose ETV Bharat

गया: ''सन 1940, बात अंग्रेजी शासनकाल की है. लाट साहब मतलब अंग्रेजों के शासन के क्रूर अफसर जिन्हें उन दिनों गर्वनर कहते थे. अपना जूता सिलवाने के लिए हरखोरी राम के पास आते थे. अंग्रेज सैनिकों के साथ घोड़े पर निकलते थे, स्थानीय लोगों पर अत्याचार करते थे. जब लोग विरोध करते थे तो उन्हें कोड़ों से पीटा जाता था. वे उन लोगों की तब तक पिटाई करते थे, जब तक शरीर से खून न बहने लगे. अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों की इंतहा देख, हरखोरी बाबा ने कसम ली थी कि अपने बच्चों को लाट साहब बनाएंगे.''

वो किस्सा.. गर्वनर के अपमान पर खाई थी कसम : दास फैमिली के सदस्य, अजय कुमार बताते हैं कि हरखोरी बाबा ने उस दिन कसम खाई थी कि अपने बच्चों को 'लाट साहब' बनाएंगे. बाबा की वो कसम आज पूरी होती दिख रही है. दास फैमिली के 20 से ज्यादा सदस्य अफसर है, परिवार में 20 से ज्यादा लोग आईपीएस, बिहार प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और न्यायिक सेवा में हैं.

देखें वीडियो (ETV Bharat)

मोची का काम करते थे दादा : वाकई बिहार के गयाजी के दास फैमिली की कहानी अनोखी है. आइये जानते है कि हरखोरी बाबा ने जो कसम खाई थी वो कहानी आखिरी कैसे आगे बढ़ी और बाबा का सपना कैसे पूरा हुआ?. जिले के बीथोशरीफ गांव के देवलाल राम एक छोटे से मिट्टी के मकान में रहते थे. उनके पिता स्वर्गीय हरखोरी राम मोची का काम करते थे. उनके परिवार ने कभी सोचा नहीं होगा कि एक दिन यही घर कई अधिकारियों की पहचान बनेगा, सफलता की वजह से परिवार में सकारात्मक बदलाव आएगा.

सरकारी नौकरी में 20 से अधिक सदस्य: देवलाल राम के बेटों और बेटी ने कठिनतम परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर उच्च पद प्राप्त किए हैं. पिछले वर्ष ही बीपीएससी परीक्षा परिणाम में उनकी दो नातिन ने सफलता पाई थी, जबकि पिछले 25 वर्षों में परिवार से सरकारी सेवा में जाने वालों की संख्या एक दर्जन से अधिक है.

दास परिवार की दी जाती है मिसाल: इनके परिवार के सदस्य आईपीएस, बिहार प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर, इंजिनियर, शिक्षक और जुडिशरी सेवा में हैं. असल में गया के बीथोशरीफ गांव के स्वर्गीय देवलाल दास ने परिवार की ऐसी नींव रखी कि आज उस परिवार की मिसाल दी जाती है.

BIHAR Das Family
बिहार के इस परिवार का हर सदस्य 'लाट साहब' (ETV Bharat)

देवलाल राम ने बच्चों को दिखायी राह: दास परिवार के रूप में इनका परिवार प्रसिद्ध है. अब तक दास परिवार में 20 से अधिक सदस्य सरकारी सेवा में जा चुके हैं. हालांकि ये बदलाव इतना आसान भी नहीं था. खुद देवलाल राम तो अधिकारी नहीं बन सके लेकिन उन्होंने अपने बच्चों, भतीजों को हमेशा यह सीख दी कि उच्च शिक्षा प्राप्त कर उन्हें अधिकारी बनना है, तभी घर की आर्थिक सुधार समेत समाज की सोच में बदलाव आ सकता है.

बदलाव के सूत्रधार रहे पिता: असल में बदलाव की कहानी के सूत्रधार देवलाल राम के पिता स्वर्गीय हल्कोरी राम हैं. हल्कोरी राम के तीन पुत्र थे, इनमें एक लाला राम, दूसरे देवलाल राम और तीसरे देवशरण राम थे. इनके पिता हल्कोरी राम पुश्तैनी काम मोची 'जूते चप्पल' सीने का करते थे. पिता के पुश्तैनी कामों में तीनों बेटे भी हाथ बटाते थे.

ईटीवी भारत GFX.
ईटीवी भारत GFX. (ETV Bharat)

"दादाजी भी चाहते थे कि उनके बच्चे मोची का काम नहीं करें, बल्कि वो पढ़ कर लाट साहब ' अधिकारी ' बनें इसलिए उन्होंने संकल्प लिया कि वो अपने बच्चों को शिक्षा दिलाएंगे. भले ही हमारे पिता और चाचा अधिकारी नहीं बने लेकिन आज उसी शिक्षा के परिणाम स्वरूप हमारे भाई और बहन , चचेरे भाई बहन के साथ उनके बच्चों ने सफलता हासिल की है. पिता जी हमेशा बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर के दिए हुए नसीहत और संविधान में मिले अधिकार को अपनाने की बात करते थे." - डॉ जितेंद्र कुमार, अधिवक्ता व सदस्य, दास परिवार

BIHAR Das Family
डॉ जितेंद्र कुमार, अधिवक्ता व सदस्य, दास परिवार (ETV Bharat)

ऐसे हुई थी शुरुआत: डॉ जितेंद्र कुमार बताते हैं कि असल में उनके भाई बहन की सरकारी नौकरी में आने का कारण समाज की तंग नजर, उत्पीड़न और ऊंच-नीच छुआछूत वाला व्यवहार भी रहा है. दादा जी मोची का काम जरूर करते थे, लेकिन वो उस समय के दौर में भी कुछ पढ़े लिखे थे. वो शिक्षा के महत्व को जानते थे, लेकिन गरीबी के कारण अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए ज्यादा प्रयासरत नहीं थे.

हालांकि दास फैमिली से जुड़ा एक और किस्सा जितेंद्र बताते हैं कि एक घटना ने दादाजी को झकझोर कर रख दिया था. एक दिन वो अपने पुश्तैनी कार्य में लगे थे. तभी गांव के ही एक बड़े व्यक्ति ने किसी बात को लेकर अपने अधिकारी पुत्र का धौंस दिखाते हुए उनके साथ दुर्व्यवहार करने का प्रयास किया, जो मेरे दादाजी, पिताजी और चाचा को ठीक नहीं लगी.

BIHAR Das Family
सरकारी नौकरी में 20 से अधिक सदस्य (ETV Bharat)

जितेन्द्र कहते हैं कि, उस दौरान दादा ने उस बड़े व्यक्ति और उसके अधिकारी बेटे को कहा था कि ठीक है, तुम आज एक अधिकारी हो और उसका रुतबा रूआब देखा रहे हो. एक समय ऐसा भी होगा जब मेरा खानदान सरकारी नौकरी और अधिकारी से भरा-पूरा होगा. तुम मेरे परिवार से मदद लेने आओगे.

लोग उड़ाते थे मजाक : जितेंद्र आगे बताते हैं कि हालांकि मेरे दादा और पिता की इस बात का लोगों ने मजाक भी उड़ाया था. समाज की ओर से ताने भी दिए जाने लगे क्योंकि पिता और चाचा कोई अधिकारी नहीं बने. लोग कहने लगे कि बेटे अधिकारी नहीं बने, हालांकि दादा जी ने प्रयास किया तो मेरे पिता जी 1970 में मलेरिया विभाग में कर्मचारी के रूप में चयनित हुए, लेकिन उन्होंने कुछ ही दिनों में नौकरी छोड़ दी, क्योंकि जिद थी अधिकारी बनने और बनाने की.

BIHAR Das Family
दास परिवार की अनोखी कहानी (ETV Bharat)

स्वस्थ्य विभाग में पहली नौकरी: देवलाल राम को जब मलेरिया विभाग में नौकरी मिली थी , उससे पहले उनकी पत्नी सरस्वती देवी स्वास्थ विभाग में सुपरवाइजर के रूप में बहाल हो चुकी थी. उसी घटना के बाद देवलाल राम के पिता हल्कोर राम ने न सिर्फ अपने बेटों को पढ़ाया, बल्कि अपनी पढ़ी लिखी बहू को सरकारी सेवा जाने के लिए प्रेरित किया.

पिता की मायूसी देख बेटे ने लिया संकल्प: सरकारी नौकरी में जाने की शुरुआत सरस्वती देवी से ही होती है, लेकिन आगे चल कर यह सिलसिला रुक जाता है. पिता की मायूसी देखकर देवलाल राम ने संकल्प लिया कि वह खुद तो अफसर नहीं बने लेकिन वो अपने बच्चों को जरूर अधिकारी बनाएंगे और फिर उन्होंने वहीं से संघर्ष शुरू किया.अपनी नौकरी छोड़ दी और बटाइ पर खेत लेकर किसानी शुरू की. बच्चों को पढ़ाने में लगे, अपने भतीजों को भी प्रेरित किया और उनकी पढ़ाई में सहयोग किया. चाचा और बाबा ने मिलकर सभी भाइयों बहनों को पढ़ाने में एक दूसरे की मदद की.

BIHAR Das Family
ईटीवी भारत GFX. (ETV Bharat)

देवलाल की बहू है टीचर: देवलाल राम के पुत्र डॉ जितेन्द्र कुमार अधिवक्ता हैं, वो गया सिविल कोर्ट में प्रैक्टिस में हैं, जबकि उनकी पत्नी बेबी कुमारी पहले राजनीति में आई और पंचायत समिति और जिला परिषद सदस्य के पद निर्वाचित हुईं. बेबी ने बीएड तक की शिक्षा प्राप्त किया था, इसलिए बाद में वो सरकारी शिक्षिका के पद पर बहाल हुईं.

मां ने बेच दिए थे गहने: अभी वर्तमान में वो एक सरकारी स्कूल की प्रधान अध्यापिका हैं. डॉ जितेंद्र कुमार अपने घर की आर्थिक तंगियों को बयान करते हुए कहते हैं कि हमारे घर में एक समय ऐसा भी आया कि खाने के लिए भी अनाज कम पड़ गए थे. पिता ने संघर्ष किया , मेहनत की, उतने में भी नहीं हुआ तो मां ने अपने गहने हम लोगों के लिए बेच दिए. जितेंद्र ने आगे बताया कि कुछ थोड़ी सी घर के पास जमीन थी उसे भी पिता ने हम लोगों को पढ़ाने के लिए बेच दिया था. क्योंकि हम लोगों को भी अच्छे शिक्षण संस्थानों से माता-पिता ने पढ़ाया है.

भाई बहनों के बीच प्रतियोगिता नहीं: डॉ जितेंद्र कुमार बताते हैं कि भाई बहनों के सरकारी नौकरी में जाने के बीच प्रतियोगी नहीं , बल्कि सहयोग का भाव रहा है और एक दूसरे की मदद की गई है. क्योंकि यह सपना पिता का था और उस सपने को सभी साकार करना चाहते थे. हम लोगों ने प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव से ही प्राप्त की है.

मां ने कही ये बात: जितेंद्र कुमार की 90 वर्षीय मां सरस्वती देवी कहती हैं कि जीवन का एकमात्र लक्ष्य बच्चों को सफलता तक पहुंचना था. घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के बावजूद उन्होंने पांचों बच्चों को पढ़ाई के लिए खुद से दूर रखा. पुश्तैनी कार्य तो उनके पति देवलाल राम से ही बंद हो गया था.

"किसानी भी आसान नहीं थी. बच्चे इस बात को समझते थे. हम अपने बच्चों से सामाजिक ताने नहीं छुपाते थे बल्कि उन्हें उसे बता कर उन्हें अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए और मजबूत किया करते थे."- सरस्वती देवी, जितेंद्र कुमार की मां

हरखोरी बाबा के परिवार में हर कोई अफसर : देवलाल राम का देहांत हो चुका है. उनके चार बेटे और एक बेटी है. पांचों ने कामयाबी की ऐसी मिसाल पेश की है कि न सिर्फ इलाके में बल्कि पूरे राज्य में उनकी चर्चा होती है. देवलाल के बेटे ओम प्रकाश भारती उम्र 55 वर्ष है, बेटी मीरा कुमारी उम्र 52 साल, डॉ जितेन्द्र कुमार अधिवक्ता उम्र 50 साल, अजय कुमार उम्र 48 साल और मनोज कुमार उम्र 46 साल है. देवलाल राम का परिवार जिले में 'दास परिवार ' के रूप में जाना जाता है.

आज बेटे-बेटियों को बनाया 'लाट साहब' : देवलाल राम के बड़े बेटे ओम प्रकाश भारती ने 90 के दशक में राजस्व विभाग में नौकरी प्राप्त की. उसके बाद 1995 के बाद दूसरे भाई अजय कुमार बीपीएससी परीक्षा पास कर प्रशासनिक सेवा में अधिकारी बने,लेकिन उन्होंने बाद में फिर बीपीएससी की परीक्षा देकर सफलता प्राप्त की और वह डीएसपी के पद पर बहाल हुए. बाद में उनका प्रमोशन आईपीएस में हुआ और वो वर्तमान में लखीसराय जिले के पुलिस अधीक्षक के रूप में कार्यरत हैं. इससे पहले वो बिहार के कई जिलों में ड्यूटी कर चुके हैं.

शादी के बाद भी बेटी करती रही तैयारी : देवलाल राम दो बेटों की सफलता से ही सिर्फ संतुष्ट नहीं हुए बल्कि उन्हें अपने घर के और बच्चों को अधिकारी बनाना था. उन्होंने हार नहीं मानी और प्रयास में लगे रहे. इसी दौरान उन्होंने अपनी बेटी की शादी कर दी. बेटी मीरा कुमारी भी अपने माता पिता के संघर्ष और इच्छा से वाकिफ थी. शादी के बाद वह घरेलू जीवन में तो व्यस्त हो गई लेकिन मन में अधिकारी बनने का सपना लेकर वह आगे बढ़ने के प्रयास में भी रही.

मीरा बनीं दारोगा: बेटी मीरा भी बिहार पुलिस सेवा में जाने की तैयारी में लगी. 2004 में उन्होंने वह कर दिखाया, जिस समय पिछड़े वर्ग के समाज की महिलाओं को सरकारी सेवा में जाना आसान नहीं था. खासकर शादीशुदा महिलाओं के लिए बहुत मुश्किल था. मीरा कुमारी ने नामुमकिन को मुमकिन कर 2004 में बिहार पुलिस में दारोगा के पद पर बहाल हुईं. यहीं से सरकारी सेवा में जाने में और तेजी आई और फिर देवलाल राम के छोटे पुत्र मनोज कुमार कल्याण विभाग में नौकरी प्राप्त की , आज वो पटना में पदस्थापित हैं.

मीरा की बेटा और बेटियां भी बनीं अधिकारी: मीरा कुमारी ने 2004 में पुलिस विभाग में एसआई के पद पर बहाल हुईं. उन्होंने भी अपने बच्चों को शिक्षित कर कठिनतम परीक्षाओं के लिए तैयार किया. पहले उनका 32 वर्षीय बेटा प्रशांत ने बीपीएससी परीक्षा में सफलता प्राप्त की. वो अभी सीनियर डिप्टी कलेक्टर के रूप में हाजीपुर में पदस्थापित है, जबकि उनकी दो बेटियों आकांक्षा उम्र 26 साल और निधि रमणिया उम्र 24 साल पिछले वर्ष बीपीएससी परीक्षा में सफलता प्राप्त कर रेवेन्यू अधिकारी के पद पर बहाल हुई हैं.

'किसी से छुपी नहीं सफलता': गांव के शिक्षक और जितेंद्र कुमार के रिश्ते के भाई कृष्णा भारती कहते हैं कि हमारे परिवार के दावे की पुष्टि के लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है. बल्कि उनके घर के परिवार को देखकर कोई भी इसका अनुमान लगा सकता है. हमारे परिवार में खासकर जितेंद्र कुमार के भाई बहन और उनके बच्चों ने जो सफलता प्राप्त की है वह किसी से छुपी नहीं हुई है.

"उनके संघर्षों को आज भी लोग याद कर मिसाल पेश करते हैं, लेकिन खास बात ये भी है जितेंद्र कुमार का परिवार आज भी अपने पुराने दिनों की तरह ही सरल जिंदगी बसर करता है. खुद जितेंद्र कुमार अपने पिता की तरह ही सरल व्यक्ति हैं और वह सामाजिक कार्यों में रुचि रखते हैं."- कृष्णा भारती, जितेंद्र कुमार के रिश्तेदार

समाज सेवा में भी आगे है दास फैमिली : दास फैमिली अपने संघर्षों, गरीबी को याद रखे हुए है. यही कारण है कि आज यह परिवार दूसरों की मदद और सहयोग के लिए पीछे नहीं हटता है. समाज सेवा में भी इस परिवार ने मिसाल पेश करने का काम किया है. खुद डॉ जितेंद्र कुमार सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचान रखते हैं.

राजनीति में भी आजमा रहे किस्मत: हालांकि जितेंद्र राजनीति में भी सफलता प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वर्तमान में वह बिहार की सत्तारूढ़ पार्टी जेडीयू में हैं और वह गया जिला अध्यक्ष के पद पर भी कार्य कर चुके हैं. साल 2000 में फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस की टिकट पर उन्होंने चुनाव भी लड़ा था. लेकिन उनकी जीत सुनिश्चित नहीं हो सकी थी.

ईटीवी भारत GFX.
ईटीवी भारत GFX. (ETV Bharat)

चाचा के बच्चे भी सरकारी सेवा में: डॉ जितेंद्र कुमार बताते हैं कि दादा जी ने जो शिक्षा की अलख जगाई थी वो आज रोशनी बिखेर रही है. न सिर्फ हमारे अपने भाई बहन सरकारी सेवा में हैं बल्कि हमारे चाचा के बेटे और बेटियों ने भी सफलता प्राप्त की है. हमारे चचेरे भाई भी सरकारी सेवा में विभिन्न पदों पर पदस्थापित हैं.

ये भी पढ़ें

बिहार की दादी, बहू और पोती.. 6 से 2 बच्चों का सफर, UNFPA रिपोर्ट में तीन पीढ़ियों की कहानी

खुद नेत्रहीन, दूसरों को बांट रही ज्ञान की रोशनी, बिहार की प्रोफेसर संगीता अग्रवाल की अनोखी कहानी

ये हैं बिहार के बुजुर्ग 'युवा'.. आंख खुलते ही चले जाते हैं जंगल.. जानें 'कैनाल मैन' की दिलचस्प कहानी

आंखों की रोशनी खोई, लेकिन हौसला नहीं, बिहार के फेकन दे रहे हैं सिलाई की ट्रेनिंग