बिहार के बिगू सर सिर्फ शाकाहारी बच्चों को पढ़ाते हैं, जानिए क्यों
शिवहर के बिगू सर सिर्फ शाकाहारी बच्चों को पढ़ाते हैं. इनके संस्थान में मांस का सेवन करने वाले बच्चों की नो एंट्री है. जानें कारण.

Published : September 16, 2025 at 5:14 PM IST
सुमित सिंह की रिपोर्ट
शिवहर: बिहार के शिवहर के दिव्यांग बिगू सर (36) सिर्फ शाकाहारी बच्चों को मुफ्त में पिछले 15 सालों से पढ़ा रहे हैं. उनका कहना है कि "जिस परिवार और समाज में मेरा जन्म हुआ था, वहां के लोग मांस-मछली का सेवन करते थे. ऐसे समाज से आने के कारण मैं भी पहले मांसाहारी था, लेकिन धीरे-धीरे मेरी सोच बदली और मैंने शाकाहार को अपना लिया. अब मैं ऐसे बच्चों को पढ़ाता हूं जो शाकाहारी हैं. साथ ही उन्हें अहिंसा और जीव रक्षा के प्रति जागरुक करता हूं."
शाकाहारी बनने की कहानी: बिगू कुमार बताते हैं कि साल 2014-2015 में वह शाकाहारी बन गए थे. यह मेरे जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था. इसके पीछे का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि रामायण और गीता का अध्ययन करते हुए मुझे यह अनुभूति हुई कि सभी जीवों की पीड़ा को समझना और उनका सम्मान करना मानव धर्म का मूल तत्व है.
"मैंने सोचा कि यदि जीव-जंतुओं को भगवान ने बेजुबान बनाया है, तो उनका दर्द अनसुना नहीं किया जाना चाहिए. यही विचार मेरे शाकाहारी बनने का प्रेरक कारण बना."- बिगू सर, दिव्यांग शिक्षक

15 सालों से जला रहे ज्ञान का दीपक: बिगू सर का घर शिवहर शहवाजा वार्ड-02 में स्थित है, जहां उनके माता-पिता कभी निर्धनता से जूझते थे. बिगू कुमार ने दिल्ली में सेल्स मैनेजर बनने के लिए संघर्ष किया, लेकिन बाद में उन्होंने समाज सेवा के पथ पर चलने का फैसला किया. ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद से बिगू कुमार 15 वर्षों से लगातार शिक्षा का दीपक जला रहे हैं.
सिर्फ शाकाहारी बच्चों को पढ़ाते हैं: बिगू कुमार बताते हैं मेरा उद्देश्य केवल उन्हें (बच्चों) मांसाहार से दूर रखना नहीं, बल्कि बच्चों के अन्दर मानवता की भावना जगाना है. ताकि वे बड़े होकर एक सभ्य, संवेदनशील समाज का निर्माण करें. मैं चाहता हूँ कि वे जानें कि हर जीव का सम्मान करना हमारे धर्म और सभ्यता का हिस्सा है. यही शिक्षा भविष्य का समाज निर्माण करेगी.
शाकाहारी विद्यावाला शिक्षण संस्थान: वर्तमान में बिगू कुमार शिवहर जिले में शाकाहारी विद्यावाला शिक्षण संस्थान संचालित करते हैं. यह संस्थान घर से कुछ दूरी पर स्थित है, जहां वे निशुल्क शिक्षा प्रदान कर रहे हैं. उनके पिता का नाम स्व. सुरेंद्र पटेल और माता का नाम धनवनती देवी है. दो से तीन वर्षों से वह लगातार 40 बच्चों को अलग-अलग शिफ्ट में पढ़ाते हैं. इसके अतिरिक्त, वे श्रीमद् भागवत कथा, रामायण और गीता का ज्ञान भी पढ़ाते हैं. आसपास के वार्डों से और दूर-दराज से बच्चे भी यहां आकर ज्ञान अर्जित करते हैं.

बचपन से ही पढ़ाने की थी ललक: बिगू कुमार ने शिक्षा के प्रति अपने अद्भुत संघर्ष की भी बात साझा की. उन्होंने बताया कि जब वे पहली क्लास में पढ़ते थे, तभी उनके मन में विचार आया कि वे दूसरे क्लास के बच्चों को पढ़ाना शुरू करें. क्योंकि जिस क्लास में वे थे, उसमें वे अपने से कम पढ़े-लिखे बच्चों को पढ़ाया करते थे. फिर जब वे तीसरी क्लास में गए, तो दूसरी क्लास के बच्चों को पढ़ाना जारी रखा. पढ़ने-पढ़ाने का सिलसिला बचपन से अब तक निरंतर चलता आ रहा है.
छात्रों को पसंद है बिगू सर के पढ़ाने का स्टाइल: बिग सर, जो दिव्यांग होते हुए भी अपने हाथ से चलकर नन्हें बच्चों को पढ़ा रहे हैं, समाज में शिक्षा और संस्कार का उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं. छात्र जयदेव सरकार, आयोग पटेल और अलख पटेल एक स्वर में बिगू सर की तारीफ करते हुए कहते हैं कि उन्हें यहां पढ़ना काफी अच्छा लगता है.
"हम यहां बहुत कुछ सीखते और पढ़ते हैं. सर बहुत अच्छे से समझाते हैं. बहुत अच्छे से फ्री में पढ़ाते हैं. हम शाकाहारी बनना चाहते हैं क्योंकि जीव हत्या से कोई लाभ नहीं है. हर जीव हमें कुछ न कुछ देते हैं. मेरे सर दिव्यांग हैं. हाथ से चलकर आते हैं और पढ़ाते हैं."- आयोग पटेल, शाकाहारी विद्यावाला के छात्र

"सर का व्यवहार बहुत अच्छा है और वह बहुत अच्छे से पढ़ाते हैं. हाथ से चलकर आते हैं और पढ़ाते हैं."- अलख पटेल, शाकाहारी विद्यावाला के छात्र
"सर का व्यवहार अच्छा है. हमें काफी कुछ सीखाते हैं. हमें यहां पढ़ना बहुत अच्छा लगता है."- सिद्धि, शाकाहारी विद्यावाला की छात्रा
1 साल की उम्र में खो दिए दोनों पैर: बिगू कुमार ने बताया कि उनके माता-पिता इस संसार में नहीं हैं और लोग बताते हैं कि वे बचपन से ही दिव्यांग हैं. उन्होंने बताया कि जब वे मात्र 1 वर्ष के थे, तब उन्हें बहुत तेज बुखार हुआ और इसके परिणामस्वरूप पोलियो की चपेट में आ गए.
जड़ी-बूटियों से हुआ था इलाज: बिगू ने कहा कि उस समय उनकी मां ने जड़ी-बूटी के माध्यम से इलाज कराया, क्योंकि आसपास कोई विशेष चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं थी. उनके माता-पिता ने डॉ कंसल्ट किए बिना जड़ी-बूटियों का सहारा लिया था, लेकिन यह विधि असफल रही. एक महीने बाद बिगू कुमार की स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती चली गई. जब दूसरों बच्चों के साथ खेलने में बिगू असमर्थ हुए तब माता-पिता को उनके दिव्यांग होने का पता चला.

अहिंसा का प्रसार-प्रचार: बिगू कुमार का मुख्य उद्देश्य बच्चों को शाकाहारी बनाना और अहिंसा का प्रचार-प्रसार करना है. उन्होंने बताया कि मैं बच्चों को इंसानियत का पाठ पढ़ाता हूं. यदि किसी जीव जंतु को भगवान ने बेजुबान बनाया है, तो इसका यह अर्थ नहीं कि उनकी पीड़ा और भाषा को अनसुना किया जाए. उन्होंने स्पष्ट किया कि वे ऐसे बच्चों को पढ़ाएंगे जो शाकाहारी बनना चाहेंगे अन्यथा वे पढ़ाने का कार्य नहीं करेंगे. उनका मानना है कि मांसाहार करने से मानसिक और शारीरिक विषाक्तता बढ़ती है. इसलिए उनका प्रयास शाकाहारी बच्चों के क्षेत्र में शिक्षा का प्रसार करना है.
सरकार से मदद की मांग: बिगू कुमार ने यह भी बताया कि सरकार की तरफ से उन्हें अभी तक कोई सहायता प्राप्त नहीं हुई है. विशेष रूप से, उन्हें बैटरी चालक साइकिल की आवश्यकता है, जो उनकी सबसे बड़ी व्यावहारिक आवश्यकता है. उन्होंने जिला प्रशासन और सरकार से आग्रह किया है कि उनकी मदद की जाए ताकि वे अपने सेवाकार्य को और बेहतर तरीके से आगे बढ़ा सकें.
दिव्यांग शिक्षक की अपील: वहीं बिगू ने अपील की कि सभी मीटिंग्स, सभाएं और सामाजिक कार्यक्रमों में इस बात को प्रोत्साहित किया जाए कि बच्चों को शाकाहारी बनने के लिए प्रेरित किया जाए. शाकाहारी बनने की महत्ता को समझाया जाए. मांसाहार के हानिकारक प्रभाव से दूर रहने की शिक्षा दी जाए.

रोजगार और सम्मान की मांग: बिगू सर की चाची, शरबती देवी ने कहा कि बहुत लंबे समय से निःशुल्क शिक्षा दे रहे हैं. उनके प्रयास से न केवल शिक्षा मिल रही है, बल्कि बच्चों को शाकाहारी बनने की सीख भी मिल रही है. उन्होंने सरकार व प्रशासन से आग्रह किया कि बिगू सर को साइकिल दी जाए ताकि वे और भी सुविधा से बच्चों को पढ़ा सकें. साथ ही यह भी कहा कि इन्हें रोजगार व सम्मान मिलना चाहिए ताकि उनके संघर्ष व सेवा का उचित मूल्यांकन हो सके.
बिगू कुमार कहते हैं कि मुझे इनाम, पद, सम्मान की कोई आवश्यकता नहीं है. मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि मेरे पढ़ाए हुए बच्चों की सफलता है. उनके चेहरे पर मुस्कान और आत्मविश्वास ही मेरे प्रयास का सबसे बड़ा पुरस्कार है.

यह कहानी एक ऐसे व्यक्तित्व की है, जो बिना किसी शो-ऑफ के, बिना मीडिया के लेंस में आए, अपने कंधों पर मानवता का दीपक थामे, अंधकार से उजाले की ओर समाज को ले जा रहा है. बिगु कुमार सिर्फ शिक्षक नहीं, सेवा और संघर्ष के सजीव उदाहरण हैं. उनका संघर्ष समाज के हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा बन चुका है. उनकी यह अविरल सेवा मानवता के प्रति असीम प्रेम का प्रतीक है.
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