नई दिल्ली : डॉ. बी.आर. आंबेडकर को शिक्षा के क्षेत्र में अपने करियर के रास्ते में कई बाधाओं का सामना करना पड़ा, उनमें से एक जर्मन पनडुब्बी भी थी.
वर्ष 1917 में, जब प्रथम विश्वयुद्ध अपने चरम पर था, आंबेडकर ने अपने पीएचडी शोध प्रबंध का एक मसौदा और पुस्तकों का एक विशाल संग्रह एसएस साल्सेट नामक जहाज के जरिये लंदन से तत्कालीन बॉम्बे भेजा था. हालांकि एक जर्मन पनडुब्बी से दागे गए टारपीडो ने उक्त जहाज के साथ ही आंबेडकर की पुस्तकों और उनके पीएचडी शोध प्रबंध के मसौदे को इंग्लिश चैनल की गहराई में डुबो दिया था. ‘प्रॉब्लम आफ रुपी’ नामक पुस्तक के लेखक आंबेडकर से जुड़ी यह घटना अब एक पुस्तक का हिस्सा बन गई है.
हालांकि इस घटना के बावजूद आंबेडकर ने आगे बढ़ने का अपना हौसला नहीं छोड़ा और उन्होंने अपना प्रयास दोगुना कर दिया. उन्हें कम से कम दो डॉक्टरेट और कई अन्य मानद उपाधियां मिलीं. इस घटना के साथ ही आंबेडकर के अथक शैक्षणिक प्रयासों को आकाश सिंह राठौर की पुस्तक 'बीकमिंग बाबासाहेब: द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ भीमराव रामजी आंबेडकर (खंड 1) में शामिल किया गया है. इस पुस्तक को हार्परकॉलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित किया गया है.
बड़ौदा छात्रवृत्ति की अवधि समाप्त होने और रियासत द्वारा वित्तीय सहायता बढ़ाने से इनकार किये जाने के बाद आंबेडकर को वर्ष 1917 की गर्मियों में भारत लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा. वे लंदन से रवाना हुए, वह शहर जहां उन्होंने एक साल से अधिक समय तक अथक परिश्रम किया था.
उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एमएससी का कोर्सवर्क पूरा कर लिया था और कोलंबिया विश्वविद्यालय में पीएचडी की तैयारी में थे. हालांकि, उन्हें अभी भी अपनी ‘मास्टर्स थीसिस’ जमा करनी थी और उनका डॉक्टरेट शोध प्रबंध भी पूरा नहीं हुआ था. इसके अलावा, उन्होंने ‘ग्रेज इन’ में अपना विधिक प्रशिक्षण शुरू ही किया था.
इस प्रकार विवश होकर उन्होंने अपनी पुस्तकें और कागजात ब्रिटिश स्टीमर एसएस साल्सेट के कार्गो में अलग-अलग भेजे तथा स्वयं एसएस कैसर-ए-हिंद पर सवार होकर भारत पहुंचे. बीस जुलाई को जर्मन पनडुब्बी यूबी-40 ने एसएस साल्सेट पर एक टारपीडो दागा. इस हमले में चालक दल के 15 सदस्य मारे गए और आंबेडकर की थीसिस के साथ-साथ उनकी पुस्तकों का विशाल संग्रह भी पानी में डूब गया.
राठौर ने अपनी पुस्तक में लिखा है, ‘‘टारपीडो के हमले के 45 मिनट बाद एसएस साल्सेट डूब गया, जिससे बड़ी संख्या में आंबेडकर की पुस्तकें और उनके महत्वपूर्ण कागजात समुद्र की तलहटी में समा गए. इसमें कोलंबिया विश्वविद्यालय में उनके डॉक्टरेट शोध प्रबंध ('द नेशनल डिविडेंड') का पहला मसौदा भी शामिल था. आंबेडकर 21 अगस्त, 1917 को बॉम्बे पहुंचे और महार समुदाय के सदस्यों ने उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए उनका भव्य स्वागत किया.
ये भी पढ़ें : क्या आपको पता है डॉ भीम राव आंबेडकर ने किस भवन में बैठकर लिखा था देश का संविधान, जानें