आपदा प्रभावित धराली का भूवैज्ञानिकों ने किया अध्ययन, हर्षिल में झील बनने का कारण भी पता चला
भूवैज्ञानिकों की टीम ने आपदा प्रभावित क्षेत्र धराली और हर्षिल का किया क्षेत्रीय भ्रमण,खास तकनीक से हटाया जा रहा हर्षिल में बने झील का पानी

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : August 15, 2025 at 6:32 PM IST
उत्तरकाशी: धराली में अभी भी मलबे के नीचे दबे जिंदगियों की तलाश है. इसके अलावा आपदा के पीछे के कारणों को भी जानने की कोशिश की जा रही है. इसके लिए वैज्ञानिक और विशेषज्ञ धराली पहुंचे हुए हैं. इसी कड़ी में सचिव खनन के निर्देशन पर औद्योगिक विकास विभाग की ओर से गठित भूवैज्ञानिक दल ने आपदा प्रभावित क्षेत्र धराली और हर्षिल का दौरा कर जानकारी जुटाई. वहीं, हर्षिल में बनी अस्थायी झील के पानी को हटाया जा रहा है.
हर्षिल में तेलगाड़ से बना जलोढ़ पंख: भूवैज्ञानिक की टीम ने आपदाग्रस्त धराली का भूगर्भीय निरीक्षण किया. साथ ही संभावित खतरे एवं बचाव के उपायों का अध्ययन किया. टीम ने खासकर हर्षिल के सामने ऊपरी हिस्से और सेना शिविर के पास एक स्थानीय धारा (गदेरा) तेलगाड़ का बारीकी से अध्ययन किया.
आपदा के दिन यानी 5 अगस्त को हुए तेज बारिश (अतिवृष्टि) की वजह से हर्षिल में तेलगाड़ गदेरा सक्रिय हो गया है. जिससे तेलगाड़ में जल सैलाब आ गया. इस गदेरे में बड़ी मात्रा में मलबा और पानी आकर भागीरथी नदी के संगम पर जमा हो गया. जिसने अब एक बड़ा जलोढ़ पंख बना दिया है.

जलोढ़ पंख ने भागीरथी नदी के प्रवाह को बाधित किया: इस जलोढ़ पंख ने भागीरथी नदी के मूल चैनल यानी प्रवाह को बाधित कर दिया. जिससे नदी के दाहिने किनारे पर एक अस्थायी झील का निर्माण हो गया. इस नई बनी झील की लंबाई करीब 1,500 मीटर थी और इसकी अनुमानित गहराई 12 से 15 फीट थी.
जलभराव ने न केवल गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग के एक हिस्से और एक हेलीपैड को डुबो दिया. बल्कि, हर्षिल नगर को भी गंभीर खतरा पैदा कर दिया. जिससे हर्षिल कस्बे की जमीन के तल का क्षरण होने लगा है. इस घटना ने भागीरथी नदी के स्थलाकृति यानी आकार को काफी बदल दिया है.
पहले दाहिने किनारे पर स्थित रेत का टीला कट किया. जबकि, कटे हुए रेत के टीले के विपरीत बाईं ओर ताजा मलबा आदि जमा हो गया, जिससे हर्षिल कस्बे में खतरा पैदा हो गया. इससे क्षेत्र में लगातार नुकसान पहुंचने लगा. जिसमें जीएमवीएन गेस्ट हाउस भी शामिल है. जिसके एक हिस्से को नुकसान पहुंचा है.

क्या होता है जलोढ़ पंख? बता दें कि जलोढ़ पंख को 'एलुवियल फैन' भी कहा जाता है. यह एक भू आकृति है, जो नदी या नाले की ओर से बहाकर लाई गई मिट्टी, बजरी और पत्थरों के जमा होने से बनती है. यह आमतौर पर एक त्रिकोणीय आकार का होता है, जो एक पहाड़ी या घाटी के आधार पर बनता है, जहां नदी या नाला समतल मैदान में प्रवेश करता है.
इस तरह से हटाया जा रहा हर्षिल में बने झील का पानी: भूवैज्ञानिक की टीम ने 12 अगस्त को बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया. निरीक्षण से पता चला कि भागीरथी नदी का बायां किनारा जलोढ़ पंख से बाधित हो गया था. यहां मलबा, गाद, कीचड़ जमा होने से पंख काफी कमजोर था. जिससे भारी मशीनरी जैसे जेसीबी और पोकलैंड को वहां पर नहीं उतारा जा सकता था.
यही मशीनें ही स्थानीय स्तर मौके पर उपलब्ध एकमात्र साधन थे. जबकि, मैनुअल यानी श्रम संसाधन भी सीमित थे. ऐसे में क्षेत्र के आंकड़ों और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर भूवैज्ञानिकों ने भागीरथी के आंशिक प्रवाह को बहाल करने के लिए एक आपातकालीन वैज्ञानिक मलबा निकासी और चैनेलाइजेशन योजना तैयार की.
सचिव खनन के निर्देशन पर उत्तराखण्ड शासन, औद्योगिक विकास विभाग द्वारा गठित भूवैज्ञानिक दल द्वारा आपदा प्रभावित क्षेत्र धराली-हर्षिल में क्षेत्रीय भ्रमण किया गया। भूवैज्ञानिक दल द्वारा दिनांक 05 अगस्त 2025 को ग्राम धराली आपदाग्रस्त का भूगर्भीय निरीक्षण करते हुए सम्भावित खतरे एवं… pic.twitter.com/cyFkC3Z6be
— Uttarakhand DIPR (@DIPR_UK) August 15, 2025
लिहाजा, हर्षिल झील में रुके हुए पानी को धीरे-धीरे छोड़ने के लिए लगभग 9-12 इंच गहराई के छोटे विचलन चैनल बनाने की योजना बनाई गई. जिसके बाद वैज्ञानिकों ने उत्तरकाशी डीएम प्रशांत आर्य और आईजी अरुण मोहन जोशी से चर्चा की. जिसमें झील के ओवरफ्लो चैनलों को तीन या चार चरणों में खोलने की योजना बनाई गई. ताकि, अचानक नीचे की ओर बाढ़ न आए.
राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ) एवं सिंचाई विभाग उत्तरकाशी की ओर से तत्काल कार्य शुरू किया गया. पहले दिन 3 चैनल एलाइनमेंट का चयन कर ढाल मापी गई. फिर चैनल निर्माण का काम शुरू किया गया. जिसके तहत उसी दिन शाम तक पानी का स्तर सभी 3 चैनलों से निकाला गया. इसके साथ ही नदी के बाईं ओर जमा मलबा भी धीरे-धीरे प्रवाहित हो गया.

अगले दिन दोबारे इसी प्रक्रिया को दोहराई गई. वहीं, उत्तरकाशी डीएम प्रशांत आर्य के साथ भूवैज्ञानिक दल ने हर्षिल झील क्षेत्र का मुआयना किया. जिसमें कार्य योजना के परिणाम सटीक मिले. जिससे झील का जलस्तर नियंत्रित हुआ और निचले भागों में जमा मलबा भी नदी के कटाव से बह गया. अब झील में जमा पानी स्तर कम हो रहा है.
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