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Explainer: क्या इथेनॉल मिश्रित ईंधन के लिए आपकी कार है तैयार?

इथेनॉल अपनी नमी के कारण संक्षारक होता है. यह उन इंजनों को नुकसान पहुंचाता है जो E27 जैसे उच्च-मिश्रित ईंधनों के लिए नहीं बने हैं.

Ethanol Blended Fuel
प्रतीकात्मक तस्वीर. (ETV Bharat (File))
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : July 24, 2025 at 4:08 PM IST

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सुरभि गुप्ता

नई दिल्ली: भारत सरकार 27% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को तेज़ी से लागू करने पर ज़ोर दे रही है. यह भारत के अधिकतर शहरी केंद्रों में आज इस्तेमाल किए जाने वाले 10-20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से काफ़ी बड़ा बदलाव है. हालांकि इसे हरित ऊर्जा परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है.

यह आमूल-चूल परिवर्तन भारत के लाखों कार मालिकों, खासकर उन लोगों के लिए भारी कीमत चुका सकता है, जिनके वाहन उच्च-इथेनॉल सामग्री पर चलने के लिए डिज़ाइन नहीं किए गए हैं.

उद्योग के विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि पर्याप्त परीक्षण और चरणबद्ध तरीके से इसे लागू किए बिना सरकार की योजनाएं इंजन के पुर्जों, गियर शिफ्टिंग को नुकसान पहुंचा सकती हैं. इसके साथ ही ईंधन की खपत बढ़ा सकती हैं. इससे उपभोक्ताओं को भारी मरम्मत बिलों का सामना करना पड़ सकता है, और वारंटी कवरेज भी नहीं मिल पाएगा.

क्या हो रहा है? भारत के इथेनॉल-मिश्रण रोडमैप के लक्ष्य न केवल महत्वाकांक्षी हैं, बल्कि बहुत बड़े भी हैं. देश भर में E10 (पेट्रोल में 10% इथेनॉल) और चुनिंदा शहरों में E20 (20% इथेनॉल) लागू करने के बाद, सरकार का प्रस्ताव है कि देशभर के खुदरा दुकानों पर इस्तेमाल होने वाले पेट्रोल की आपूर्ति में E27 (27% इथेनॉल) को शामिल किया जाएगा.

यहां पेंच यह है कि भारत में वर्तमान में सड़कों पर चलने वाली अधिकतर पेट्रोल कारें E10 या E20 के लिए प्रमाणित हैं. इससे ऊपर की कोई भी मात्रा इंजन के महत्वपूर्ण पुर्जों के लिए जोखिम पैदा करती है.

एक ऑटोमोबाइल इंजीनियर ने ईटीवी भारत को बताया, "इथेनॉल एक बॉयोमास-व्युत्पन्न ईंधन है और इसमें नमी होती है, जो इसे संक्षारक बनाती है. इथेनॉल मिश्रण देश के ईंधन आयात के बोझ को कम करने में मदद कर रहा है, लेकिन चूंकि पेट्रोल की खपत कम हो जाती है. यह इंजनों के लिए आदर्श नहीं है. यही कारण है कि सरकार ने उपयोगकर्ता-विशिष्ट ईंधन मानदंड लागू किए हैं."

इथेनॉल की इंजीनियरिंग चुनौतियां: पेट्रोल में अधिक से अधिक मात्रा में इथेनॉल मिलाने के इंजीनियरिंग प्रभावों ने मुख्य इंजन घटकों को फिर से डिज़ाइन करने की जरूरतों को बढ़ा दिया है. इंजीनियर ने आगे कहा, "हम अब नए इंजन डिज़ाइन विकसित कर रहे हैं और उनका परीक्षण उच्च इथेनॉल मिश्रणों - 25%, 30%, यहां तक कि 35% तक - के साथ कर रहे हैं." "एक बड़ी चुनौती यह है कि इथेनॉल की संक्षारक प्रकृति इंजन के घटकों को प्रभावित करती है. उदाहरण के लिए, मौजूदा इंजनों के कई पुर्जे केवल 1 मिमी मोटे होते हैं. इथेनॉल के संक्षारण से बचने के लिए, अब हमें मोटाई बढ़ानी होगी और अधिक एल्युमीनियम का उपयोग करना होगा."

इस डिज़ाइन परिवर्तन के कारण इंजन भारी हो जाता है, जिससे ईंधन दक्षता कम हो जाती है. विडंबना यह है कि जिस तरह वैश्विक वाहन निर्माता बेहतर माइलेज और प्रदर्शन के लिए वाहनों का वजन कम करने का लक्ष्य रखते हैं. उसी तरह इथेनॉल मिश्रण इस प्रवृत्ति को उलटने के लिए मजबूर कर रहा है.

पुराने वाहनों पर इसका प्रभाव विशेष रूप से गंभीर है. विशेषज्ञ ने चेतावनी दी, "नई पीढ़ी के वाहन बीएस-VI या उपयोगकर्ता श्रेणी 2 और 3 मानदंडों के तहत इन मिश्रणों का प्रबंधन कर सकते हैं. लेकिन पुराने वाहन, खासकर 1995 और 1999 के बीच निर्मित वाहन, इतने उच्च इथेनॉल मिश्रण पर चलने पर गंभीर नुकसान का सामना करेंगे."

पूर्व परिवहन आयुक्त की राय: दिल्ली परिवहन विभाग के पूर्व उपायुक्त अनिल छिकारा ने भी इन चिंताओं को दोहराया. उन्होंने कहा, "अगर हम पुराने वाहनों में E27 का इस्तेमाल करते हैं, तो इससे समस्याएं पैदा हो सकती हैं. इससे रुकावट पैदा हो सकती है, बिजली गुल हो सकती है. हमारे धुएं से निकलने वाले बिना जले ईंधन के रूप में भी इसका कुछ असर हो सकता है."

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह बदलाव सरकारी वाहनों से शुरू होना चाहिए. "इसे जनता के लिए अनिवार्य बनाने से पहले उद्योगों, वाहनों के मालिकों या सरकारी वाहनों द्वारा इस्तेमाल किया जाना चाहिए."

E27 सबके लिए एक जैसा क्यों नहीं हो सकता: ब्राज़ील या अमेरिका के विपरीत, जहां लचीला ईंधन ढांचा ड्राइवरों को अनुकूल ईंधन चुनने की अनुमति देता है, भारत में यह विकल्प मौजूद नहीं है. खुदरा दुकानें केवल एक ही मिश्रित ग्रेड की सेवा देंगी. इससे पुराने वाहनों और उच्च-प्रदर्शन इंजनों के मालिकों के पास कोई सुरक्षित विकल्प नहीं बचेगा.

छिकारा ने चेतावनी देते हुए कहा, "अमेरिका या ब्राज़ील में इथेनॉल-आधारित पेट्रोल या फ्लेक्सी ईंधन चल रहे हैं, लेकिन उनकी भौगोलिक स्थिति अलग है. समाज का स्तर अलग है. भारत के लिए, हमें अपनी प्रणालियों को संतुलित करना होगा, ताकि वे हमारे किसानों की आय को नुकसान न पहुंचाएं."

उन्होंने आगे कहा, "E27 को मुख्यधारा में लाने से पहले हमें परीक्षण स्थितियों, प्रयोगशालाओं या नियंत्रित क्षेत्रीय अध्ययनों पर ध्यान केंद्रित करना होगा. आर्द्रता, तापमान, भार और ऊंचाई जैसे कारक दहन को प्रभावित करते हैं. यहां तक कि प्रज्वलन समय को भी पुनः समायोजित करना होगा."

अपर्याप्त परीक्षण और आंकड़ों की कमी: विशेषज्ञों का कहना है कि इंडियन ऑयल या बीपीसीएल द्वारा बहुत कम अध्ययन प्रकाशित किए गए हैं, जो यह स्थापित करते हैं कि विभिन्न भारतीय परिस्थितियों में E27 कैसा प्रदर्शन करता है. एक प्रमुख चिंता यह है कि वास्तविक दुनिया के वाहन गतिशील परिस्थितियों में काम करते हैं. जैसे यातायात, मौसम, भार में बदलाव और असंगत रखरखाव, ये सभी ईंधन के व्यवहार को प्रभावित करते हैं.

एक तकनीकी सलाहकार ने कहा, "उच्च इथेनॉल ईंधन के लिए संपीड़न अनुपात, प्रज्वलन समय, स्पार्क प्लग प्रतिक्रिया, इन सभी को समायोजित किया जाना चाहिए." "लेकिन किसी भी निर्माता ने दीर्घकालिक परीक्षणों से निर्णायक आंकड़े जारी नहीं किए हैं."

उन्होंने आगे कहा कि इन ईंधनों का परीक्षण पहले ग्रामीण या अर्ध-शहरी सार्वजनिक परिवहन वाहनों, जैसे ऑटोरिक्शा या मिनी बसों में किया जाना चाहिए. जहां भार मध्यम होता है. साथ ही उसका उपयोग पूर्वानुमानित होता है. "जब तक ये परीक्षण नहीं हो जाते, E27 को बड़े पैमाने पर बाजार में उतारना तकनीकी रूप से जोखिम भरा है."

कैटेलिटिक कन्वर्टर्स खतरे में: आधुनिक वाहनों में सबसे महंगे और नाजुक पुर्जों में से एक कैटेलिटिक कन्वर्टर है. बीएस-6 मानकों के साथ, कन्वर्टर्स की कीमत अब लाखों रुपये हो गई है. इथेनॉल, संक्षारक और ऑक्सीजन युक्त होने के कारण, इन कन्वर्टर्स को कीचड़ जमा होने या अपूर्ण दहन उपोत्पादों का कारण बनकर नुकसान पहुंचा सकता है.

सलाहकार ने कहा, "समय से पहले इनका इस्तेमाल इन प्रणालियों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकता है." "यह केवल मरम्मत का मामला नहीं है; यह स्वामित्व की लागत का संकट बन जाता है."

अनुकूलता और रेट्रोफिट: निर्माता की ज़िम्मेदारी: अप्रैल 2025 के बाद निर्मित वाहनों पर E20 अनुकूलता दर्शाने वाले स्टिकर लगे होंगे. इन नए वाहनों में बेहतर रबर कंपोनेंट, गैस्केट और पॉलिमर लगे होंगे जो इथेनॉल के क्षरण को रोकते हैं. लेकिन लाखों मौजूदा वाहन इन मानकों के अनुसार नहीं बने हैं.

एक अन्य तकनीकी विशेषज्ञ ने कहा, "पुराने वाहनों के लिए E10 ठीक काम कर रहा है, लेकिन E20 के लिए भी निर्माताओं को कंपोनेंट अपग्रेड करने पड़े." "रबर के पुर्जे घिस जाते हैं, एल्युमीनियम में जंग लग जाता है, और यहाँ तक कि ईंधन इंजेक्टर भी जाम हो सकते हैं."

जबकि E20-संगत वाहन बाज़ार में आ रहे हैं. E27 में बदलाव के लिए और समायोजन की आवश्यकता है. जब तक ये मानक नहीं बन जाते, विशेषज्ञ ने इस पर विराम लगाने की सलाह दी. "E27 पर तभी चर्चा होनी चाहिए, जब E20 का पूरी तरह से परीक्षण हो जाए और वह सफलतापूर्वक बाज़ार में आ जाए."

उत्सर्जन तर्क: इथेनॉल के समर्थक इसके लाभों पर ज़ोर देते हैं. कम उत्सर्जन, कम आयात बिल और पर्यावरण-अनुकूल ईंधन. चिकारा ने कहा, "इससे हमारी विदेशी मुद्रा की बचत होगी और हानिकारक कार्बन मोनोऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आएगी." "इथेनॉल में ज़्यादा ऑक्सीजन होती है, जिससे दहन बेहतर होता है."

लेकिन इसके साथ भी कुछ सावधानियां हैं. ज़्यादा ऑक्सीजन होने से इंजन के पुर्जों के ऑक्सीकरण का ख़तरा भी बढ़ जाता है. इससे वाहन निर्माताओं पर दोहरा बोझ पड़ता है. उत्सर्जन मानकों को बनाए रखना और साथ ही संवेदनशील इंजन प्रणालियों को फिर से डिज़ाइन करना.

कृषि संबंधी विचार: एक और पहलू है: इथेनॉल की आपूर्ति. इथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने या अन्य स्टार्च-आधारित फसलों से प्राप्त होता है. चिकारा ने चेतावनी दी, "हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ईंधन मिश्रण से खाद्य फसलों को ईंधन में बदलने से किसानों को नुकसान न हो."

भारत पहले से ही सूखे और खाद्य मुद्रास्फीति के चक्र का सामना कर रहा है, इसलिए कृषि योग्य भूमि को इथेनॉल उत्पादक फसलों की खेती के लिए बदलने के सामाजिक-आर्थिक परिणाम हो सकते हैं. हरित ईंधन लक्ष्यों और खाद्य सुरक्षा के बीच एक सावधानीपूर्वक संतुलन आवश्यक है.

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