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दिल्ली AIIMS में पहली बार हुआ पांच माह के भ्रूण का डोनेशन, अब इस पर होगी रिसर्च; जानिए क्या बोले डॉक्टर

मां के गर्भ में ही हुई पांच माह के बच्चे की मौत के बाद परिवार ने लिया भ्रूण डोनेशन का निर्णय, एमबीबीएस स्टूडेंट्स करेंगे रिसर्च

दिल्ली एम्स में पहली बार हुआ पांच माह के भ्रूण का डोनेशन
दिल्ली एम्स में पहली बार हुआ पांच माह के भ्रूण का डोनेशन (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Delhi Team

Published : September 9, 2025 at 8:29 PM IST

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नई दिल्ली: दिल्ली एम्स के एनाटॉमी विभाग में 5 महीने के भ्रूण का डोनेशन हुआ है. इस भ्रूण पर दिल्ली एम्स में रिसर्च की जाएगी. एम्स द्वारा इस पर किस तरह की रिसर्च होगी और यह किस पर काम आएगी. भ्रूण पर रिसर्च करने का एम्स में यह पहला मामला है. इसके बारे में ईटीवी भारत ने दिल्ली एम्स में एनाटॉमी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सुब्रतो बासु रे (एसबी रे) से बातचीत की. डॉ एसबी रे ने बताया कि दिल्ली एम्स में पांच महीने के भ्रूण डोनेशन का यह पहला मामला है.

रोहिणी इलाके के रहने वाले परिवार ने खुद किया संपर्क: बाहरी दिल्ली के रोहिणी इलाके के रहने वाले परिवार ने डोनेशन के लिए खुद एम्स आकर संपर्क किया. उसके बाद हमने डोनेशन से संबंधित प्रक्रिया पूरी की. डॉक्टर एसबी रे ने बताया कि यह भ्रूण डोनेशन दंपत्ति की बॉडी डोनेशन या ऑर्गन डोनेशन के प्रति जागरूकता का प्रमाण है. जागरूक और सामाजिक कार्यों से जुड़े होने के कारण परिवार ने यह सराहनीय निर्णय लिया.

एम्स में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे छात्रों को मिलेगी मदद : डॉक्टर रे ने बताया कि इस भ्रूण से हमारे एम्स में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे मेडिकल स्टूडेंट्स रिसर्च कर सकेंगे. उन्होंने बताया कि मां के गर्भ में बच्चे का किस तरह से विकास होता है. उसके अंग बनते हैं और पांच महीने के भ्रूण का कितना विकास होता है और उसमें क्या कमी रहती है इन सब विषय पर रिसर्च हो सकेगी. उन्होंने बताया कि अभी तक हम लोगों के संपर्क में बच्चा जन्म होने के बाद ही आता है. पहली बार हम एम्स के एनाटॉमी (शरीर रचना विज्ञान) विभाग में किसी भ्रूण पर रिसर्च करेंगे.

दिल्ली एम्स में पहली बार हुआ पांच माह के भ्रूण का डोनेशन (ETV Bharat)

विदेशों में पहले से होती है भ्रूण पर रिसर्च : डॉक्टर एसबी रे ने बताया कि विदेशों में देहदान और अंगदान के प्रति लोगों में अधिक जागरूकता है. इसकी वजह से वहां पर पहले से ही भ्रूण डोनेशन भी होता है. साथ ही वहां के मेडिकल स्टूडेंट्स रिसर्च कर पाते हैं. उन्होंने बताया कि देश में मेडिकल रिसर्च के लिए स्टूडेंट्स को डेडबॉडी बहुत कम मिल पा रही हैं. इसका बड़ा कारण यही है कि लोगों में देहदान के प्रति जागरूकता की कमी है. लोगों को ये पता ही नहीं है कि इस तरह के भ्रूण का भी देहदान हो सकता है. उन्होंने बताया कि अंगदान के लिए सबसे पहले एम्स में आकर के फॉर्म भरना होता है.

रोहिणी इलाके के रहने वाले परिवार ने खुद किया संपर्क
रोहिणी इलाके के रहने वाले परिवार ने खुद किया संपर्क (ETV Bharat)

एनाटॉमी विभाग में होता है सिर्फ देहदान, नहीं होता अंगदान : डॉक्टर एसबी रे ने बताया कि एनाटॉमी विभाग में सिर्फ देहदान होता है. यहां पर अंगदान नहीं होता है. उन्होंने बताया कि एनाटॉमी विभाग में अधिकतर बुजुर्गों की नेचुरल डेथ होने पर देहदान होता है. उन्होंने बताया कि एनाटॉमी विभाग में लोग सिर्फ आंखों को भी डोनेट कर सकते हैं और बाकी की डैडबॉडी को अंतिम संस्कार के लिए ले जा सकते हैं. डॉक्टर रे ने बताया कि एनाटॉमी विभाग में एक्सीडेंट और सुसाइड वाली डेडबॉडी का डोनेशन नहीं होता है.

सिर्फ नेचुरल डेथ वाली ही ली जाती है डेडबॉडी : हमारे यहां सिर्फ नेचुरल डेथ वाली ही डेडबॉडी ली जाती हैं. यहां रिसर्च के लिए डेडबॉडी और भ्रूण की बड़ी आवश्यकता रहती है. उन्होंने यह भी बताया कि मृत्यु से चार से पांच घंटे के अंदर डोनेशन हो जाना चाहिए. डोनेशन लेने के लिए एम्स खुद अपनी टीम भेजता है.

दिल्ली एम्स में पहली बार हुआ पांच माह के भ्रूण का डोनेशन
दिल्ली एम्स में पहली बार हुआ पांच माह के भ्रूण का डोनेशन (ETV Bharat)

देहदान समिति और परिजनों के सहयोग से हो सका भ्रूण दान : इस भ्रूण डोनेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली संस्था दधीचि देह दान समिति के उपाध्यक्ष सुधीर गुप्ता ने बताया कि आशीष जैन और वंदना जैन (32 वर्षीय महिला) के पांच माह के गर्भस्थ बच्चे की किसी कारणवश गर्भ में ही डेथ हो गई थी. उन्होंने कहा कि इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात इस मामले में यह थी की इस हृदयविदारक क्षति के तुरंत बाद, जैन परिवार ने चिकित्सा अनुसंधान के लिए भ्रूण दान करने की अपनी इच्छा व्यक्त की. उसी क्षण से, डीडीडीएस समन्वयकों और एम्स अधिकारी इस डोनेशन की प्रक्रिया को पूरा कराने में जुट गए. पूरे दिन, कई कॉल, मैसेज और दस्तावेज़ों के आदान-प्रदान को सावधानी से संभाला गया.

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