नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट को विकसित करने में CSIR-CIMFR की भूमिका महत्वपूर्ण, वैज्ञानिकों ने ईटीवी भारत को बताया क्या थी परेशानी
नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के निर्माण में धनबाद के वैज्ञानिकों का अहम योगदान रहा. वैज्ञानिकों ने बताया वहां क्या थी परेशानी.

Published : October 11, 2025 at 7:13 PM IST
धनबाद: 8 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के निर्माण में Central Institute of Mining and Fuel Research Dhanbad (CIMFR) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. धनबाद के सीएसआईआर-सीआईएमएफआर (CIMFR) के वैज्ञानिकों की बदौलत एयरपोर्ट बन पाया है. चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद, वैज्ञानिकों ने 92 मीटर ऊंची उलवे हिल का समतलीकरण और उलवे नदी की धारा को मोड़कर इस परियोजना को सफलतापूर्वक पूरा किया.
तकनीकी चुनौतियों पर जीत
सिंफर के निदेशक डॉ. एके मिश्रा ने बताया कि नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के निर्माण में कई तकनीकी कठिनाइयां थीं. सिडको और अदाणी समूह ने इन समस्याओं के समाधान के लिए सीआईएमएफआर के वैज्ञानिकों से सहयोग मांगा. एयरपोर्ट स्थल पर 92 मीटर ऊंची उलवे हिल थी, जिसकी लंबाई 1.6 किमी और चौड़ाई 1.2 किमी थी. इसके साथ ही उलवे नदी की धारा को मोड़ना भी आवश्यक था. आसपास के आठ गांवों और लगभग 400 मकानों के साथ-साथ हाईटेंशन लाइनों की मौजूदगी ने ब्लास्टिंग को और जटिल बना दिया था, क्योंकि इन लाइनों से मुंबई को बिजली आपूर्ति होती है. ब्लास्टिंग के दौरान अगर हाइटेंशन प्रभावित होती तो इंस्ट्रीज पर इसका बुरा असर पड़ता. मुंबई के आम लोगों को बिजली सप्लाई बंद हो जाती इसके साथ ही इंस्ट्रीज पर इसका बुरा असर पड़ता. ब्लास्टिंग के दौरान किसी भी तरह का नुकसान न हो, इसका विशेष ध्यान रखा गया.
सुपर कंट्रोल ब्लास्टिंग से हुआ निर्माण
सिडको ने 2016 में सीआईएमएफआर के रॉक रिसर्च इंजीनियरिंग ग्रुप से चर्चा की थी. संस्थान के पिछले कार्यों को देखकर सिडको को भरोसा हुआ कि भारतीय तकनीक से यह परियोजना पूरी की जा सकती है. सिंफर के रॉक रिसर्च इंजीनियरिंग ग्रुप से सिडको की एक विशेष चर्चा हुई थी. पुराने अन्य कार्यों को देखते हुए सिडको को विश्वास हुआ कि साइंटिफिक तरीके से सभी कठिनाई को दूर करते हुए CSIR CIMFR के वैज्ञानिकों के द्वारा एयरपोर्ट विकसित किया जा सकता है. वह भी बिना किसी विदेशी संस्था के सहयोग के एयरपोर्ट विकसित करने सिडको ने ठानी. उन्हें यह विश्वास हो गया भारतीय तकनीक का इस्तेमाल कर एयरपोर्ट को विकसित किया जा सकता है.

जून 2017 में निर्माण कार्य शुरू हुआ और वैज्ञानिकों ने 24 घंटे, 365 दिन मेहनत कर इसे अंजाम दिया. सुपर कंट्रोल ब्लास्टिंग तकनीक का उपयोग कर 62 मिलियन क्यूबिक मीटर चट्टानों को हटाया गया. वैज्ञानिक डॉ. सी. सोमनिया ने बताया, “आसपास के गांवों और हाईटेंशन लाइनों के कारण वाइब्रेशन को नियंत्रित करना बड़ी चुनौती थी, लेकिन हमारी टीम इसमें सफल रही.”

टीम का आत्मविश्वास और अनुभव
टीम लीडर वैज्ञानिक डॉ. एमपी राय ने कहा कि जनवरी 2017 में नवी मुंबई का पहला दौरा किया गया था. “यह शहरी क्षेत्र था और चुनौतियां कई थीं. हमारी टीम ने पहले भी कई प्रोजेक्ट्स में कंट्रोल ब्लास्टिंग की थी, जिसके अनुभव से हम आत्मविश्वास से भरे थे.” कोविड काल में काम की गति धीमी हुई, लेकिन इसे बंद नहीं किया गया. वैज्ञानिक डॉ. रणजीत कुमार पासवान ने बताया कि ब्लास्टिंग से निकली चट्टानों का उपयोग ही लैंड डेवलपमेंट के लिए किया गया, जिसके लिए प्रत्येक ब्लास्ट को अलग-अलग डिजाइन करना पड़ता था.

वैज्ञानिकों का गर्व
वैज्ञानिक डॉ. विवेक कुमार हिमांशु ने कहा, “2017 में मैं पहली ब्लास्टिंग टीम का हिस्सा था. यह मेरे लिए गर्व की बात है.” वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी सूरज कुमार ने बताया कि मई 2017 में संस्थान में शामिल होने के बाद जून में इस प्रोजेक्ट का पहला ब्लास्ट करने का अवसर मिला. “आखिरी ब्लास्ट तक मैं टीम का हिस्सा रहा. आसपास के लोग भी हमारे काम से संतुष्ट थे.” रमा शंकर यादव ने कहा कि 24 मीटर ऊंचे बेंच वाले हिल में 600 होल्स के ब्लास्ट को चार हिस्सों में बांटा गया, जो एक बड़ा कार्य था.

आगे की योजनाएं
नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट नवंबर 2025 से बुकिंग शुरू करेगा और दिसंबर से हवाई यात्रा संभव होगी. इसके साथ ही एयरो सिटी के विकास का जिम्मा भी सीआईएमएफआर को सौंपा गया है, जिसके लिए 30-35 मीटर ऊंची पहाड़ियों का समतलीकरण जून 2026 तक पूरा होगा. यह उपलब्धि न केवल धनबाद, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है.
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