कुरुक्षेत्र में "बाणगंगा" के अनसुलझे रहस्य, कभी नहीं सूखने वाले सरोवर के साथ एक "धातु" भी बना हुआ मिस्ट्री
कुरुक्षेत्र के बाणगंगा तीर्थ में आज भी ऐसे कई अनसुलझे रहस्य हैं जिनसे पर्दा उठना बाकी है.

Published : August 21, 2025 at 5:26 PM IST
कुरुक्षेत्र : महाभारत के युद्ध को कौन नहीं जानता. हरियाणा के कुरुक्षेत्र में महाभारत की लड़ाई लड़ी गई थी जो कौरव और पांडवों के बीच में हुई थी. ये लड़ाई कुरुक्षेत्र, कैथल, करनाल, जींद, पानीपत जिलों की भूमि पर लड़ी गई थी जिसको अब 48 कोष कहा जाता है. महाभारत की लड़ाई के लिए 48 कोष की भूमि में 350 से ज्यादा तीर्थ स्थल चिन्हित किए गए हैं जो कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के अंतर्गत आते हैं. इन्हीं में से एक तीर्थ बाणगंगा तीर्थ है जिसका इतिहास महाभारत से जुड़ा हुआ है. बाणगंगा तीर्थ में कई ऐसे रहस्य हैं जिनसे आज तक पर्दा नहीं उठ सका है.
क्या है बाणगंगा तीर्थ का इतिहास ? : बाणगंगा तीर्थ के मुख्य पुजारी जय नारायण ने बताया कि बाणगंगा तीर्थ कुरुक्षेत्र के दयालपुर गांव में स्थित है. यहां पर भीष्म पितामह ने अपनी अंतिम सांस ली थी और इस स्थान पर ही भीष्म पितामह ने अंतिम बार जल ग्रहण किया था. युद्ध के दौरान भीष्म पितामह कई दिनों तक बाण की शैया पर लेटे हुए थे क्योंकि उनको इच्छामृत्यु का वरदान मिला हुआ था और तब उन्होंने अपने प्राण त्यागने से पहले पानी पीने की इच्छा जाहिर की. तब सभी योद्धा उनके लिए पानी लेकर आए लेकिन उन्होंने कहा कि जिसने मुझे बाणों की शैया पर लेटाया है, उसके हाथ से ही मुझे गंगा का जल ग्रहण करना है. तब भगवान श्री कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने अपने धनुष से बाण मारकर धरती से गंगा को प्रकट किया था और भीष्म पितामह को जलग्रहण करवाया था. इसके बाद उन्होंने अपने प्राण त्यागे थे. तभी से इसे बाणगंगा कहा जाने लगा. बाद में इस जगह पर तीर्थ का निर्माण हुआ जो आज भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी जाना जाता है.
बाणगंगा सरोवर के कई अनसुलझे रहस्य : पंडित पवन कुमार ने कहा कि बाणगंगा तीर्थ का विशेष महत्व है क्योंकि यहां पर बाणगंगा सरोवर है जो कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के अंतर्गत आता है. इस सरोवर के कई अनसुलझे रहस्य है. उन्होंने बताया कि कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड और ग्राम पंचायत ने इस सरोवर की कई बार खुदाई भी करने की कोशिश की लेकिन कभी भी खुदाई पूरी नहीं हो पाई. उन्होंने बताया कि इसके अंदर एक छोटा कुआं है जिससे पानी निकलता रहता है और इसका पानी कभी खत्म नहीं होता है. नीचे से पानी लगातार आता रहता है. इसके चलते पूरी खुदाई नहीं हो पाई है.

"धातु का पता नहीं चला" : उन्होंने कहा कि जब अर्जुन ने धरती में तीर मार कर बाणगंगा को निकाला था तो इसे उसी घटना से जोड़कर देखा जाता है. उन्होंने कहा कि इसके अंदर एक लकड़ी नुमा कुछ वस्तु भी है जिसका आकार तीर के जैसा है. उसके ऊपर भी कई बार रिसर्च करने की कोशिश की गई है, लेकिन आज तक पता नहीं चल सका है कि वो किस धातु का बना हुआ है.

पूजा पाठ करने से मिलता है विशेष फल : पंडित ने बताया कि बाणगंगा तीर्थ पर पूजा अर्चना करने का विशेष महत्व मिलता है. यहां पर स्नान करने से कई प्रकार के पाप और कष्ट दूर होते हैं. पुराणों के अनुसार भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को इस स्थान पर पिंडदान करने से इंसान को मुक्ति प्राप्त होती है जिसका जिक्र वामन पुराण में भी मिलता है. इसलिए यहां पर हजारों लाखों की संख्या में हर साल श्रद्धालु आते हैं और पूजा अर्चना करते हैं. भारत ही नहीं विदेशों से भी यहां पर तीर्थ स्थल पर लोग भ्रमण करने के लिए आते हैं.

बाणगंगा तीर्थ की संरचना : बाणगंगा तीर्थ क्षेत्र में बाणगंगा सरोवर है और यहां पर हनुमानजी की विशालकाय प्रतिमा भी स्थापित की हुई है और साथ में भीष्म पितामह की मूर्ति भी है जो बाणों की शैया पर लेटे हुए हैं. यहां पर महाभारतकालीन एक प्राचीन लक्ष्मी नारायण मंदिर भी है जो लाल लाखोरी ईंटों से बना हुआ है.

बाणगंगा तीर्थ के चलते मशहूर है गांव : बाणगंगा तीर्थ का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है और यहां पर इस तीर्थ की वजह से हजारों लाखों पर्यटक भ्रमण करने के लिए आते हैं. इसकी वजह से इनका गांव भारत ही नहीं, विदेशों में भी जाना जाता है.






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