AI ने खोली स्ट्रोक के सुपर-फ़ास्ट इलाज की राह, देश में हर तीन में से एक व्यक्ति को Stroke का खतरा!
भारत में स्ट्रोक मैनेजमेंट को नई गति दे रहा है एआई, वैश्विक विशेषज्ञ एक मंच पर जुटे
Published : December 13, 2025 at 3:51 PM IST
नई दिल्ली: मेडिकल फील्ड में भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की उपयोगिता तेजी के साथ बढ़ती जा रही है. न्यूरोलॉजी व स्ट्रोक केयर के क्षेत्र में भी एआई के उपयोग से डायग्नोसिस और उसके इलाज में तेजी आई है. इसी विषय पर शनिवार को स्ट्रोक एंड एआई सम्मेलन की शुरुआत इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुई. विशेषज्ञों ने यहां आधुनिक स्ट्रोक केयर में एआई के उपयोग को लेकर वैश्विक स्तर पर नई चर्चा को गति दी.
कॉन्फ्रेंस के ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी डॉ. बिप्लब दास ने कहा कि स्ट्रोक या लकवा के बारे में जागरूकता होना जरूरी है. जब किसी को स्ट्रोक आता है तो तुरंत उसके लक्षणों को पहचानना जरूरी है. उन्होंने बताया कि स्ट्रोक किसी भी व्यक्ति को हो सकता है. जब किसी को स्ट्रोक होता है तो उसकी आंखों के सामने अंधेरा हो जाता है, हाथ पैरों में कमजोरी महसूस होती है और मुंह या शरीर का कोई भी अंग टेढ़ा हो जाता है.
भारत में हर तीन में से एक व्यक्ति को है स्ट्रोक का खतरा
डॉक्टर बिप्लब दास ने बताया कि वर्ल्ड स्ट्रोक एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, विश्व में हर चार में से एक व्यक्ति को स्ट्रोक होने का खतरा है. भारत में हर तीन में से एक व्यक्ति को स्ट्रोक का खतरा. ये आंकड़े बताते हैं कि स्ट्रोक अवेयरनेस कितनी जरूरी है. उन्होंने कहा कि एआई में वह क्षमता है, जो स्ट्रोक की पहचान, वर्गीकरण और इलाज की प्रक्रिया को बदल सकती है. खासतौर पर तब, जब इसे आधुनिक उपचार तकनीकों के साथ जोड़ा जाए. इस सम्मेलन का उद्देश्य ऐसे सहयोग विकसित करना है, जिनसे एआई आधारित इनोवेशन रोजमर्रा की क्लिनिकल प्रैक्टिस का हिस्सा बन सकें.
एआई की मदद से इस तरह से इलाज में मिल रही हेल्प
सीनियर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. आदित्य गुप्ता ने कहा, ''स्ट्रोक का मतलब यह होता है कि दिमाग के किसी न किसी हिस्से में ब्लीडिंग हुई है. अब एआई की मदद से हम स्ट्रोक होने पर यह जल्दी पता लगा सकते हैं कि दिमाग की कौन सी बारीक से बारीक नस में प्रॉब्लम या एब्नार्मेलिटी है. जब इसका जल्दी पता चल जाता है तो इलाज में देरी नहीं होती है. उन्होंने बताया कि स्ट्रोक के मरीज को जितनी जल्दी इलाज मिलता है उतना अच्छी रिकवरी होती है.
डॉ. आदित्य गुप्ता ने बताया कि अभी तक यह होता था कि जैसे कोई स्ट्रोक का मरीज इमरजेंसी में आया तो उसको न्यूरोलॉजिस्ट देखता था. फिर वो लिखता था कि इसका सीटी स्कैन और अन्य इमेजिंग होनी है. फिर न्यूरो रेडियोलॉजिस्ट स्कैनिंग करता था. फिर उसकी इमेजिंग को देखने और समझने में डॉक्टर को समय लगता था, जिससे इलाज में थोड़ी सी देरी होती थी. अब इमेजिंग के साथ ही एआई के माध्यम से यह सटीक रूप से पता चल जाता है कि कौन सी पतली से पतली नस में ब्लॉकेज या समस्या है.
एआई आधारित स्ट्रोक मैनेजमेंट में वर्ल्ड लीडर बन सकता है भारत
स्ट्रोक एंड एआई 2025 के चेयरपर्सन पद्मश्री डॉ. कामेश्वर प्रसाद ने कहा कि स्ट्रोक केयर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है और इस बदलाव के केंद्र में एआई है. उन्होंने कहा कि एआई थ्रोम्बेक्टोमी व एडवांस्ड इमेजिंग जैसी प्रिसिशन प्रक्रियाओं को और बेहतर बना सकता है. यहां मौजूद विशेषज्ञ इस साझा लक्ष्य को आगे बढ़ा रहे हैं कि टेक्नोलॉजी की मदद से स्ट्रोक से होने वाली मृत्यु और डिसेबिलिटी को कम किया जाए. साथ गी स्ट्रोक केयर अधिक सुलभ बनाया जाए.
राष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षण और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के महत्व पर जोर देते हुए इंडियन स्ट्रोक एसोसिएशन की प्रेसिडेंट डॉ. पी. विजया ने कहा कि भारत एआई आधारित स्ट्रोक प्रबंधन में वैश्विक लीडर बन सकता है, बशर्ते हम स्ट्रक्चर्ड ट्रेनिंग, डिजिटल नेटवर्क और तेज़ रेस्पॉन्स सिस्टम में निवेश करें. आज साझा किए गए विचारों ने स्पष्ट किया कि एआई इमेजिंग इंटरप्रिटेशन, इमरजेंसी ट्रायेज और ट्रीटमेंट प्लानिंग में मौजूदा गैप को कम कर सकता है, खासकर उन जगहों पर जहां संसाधन सीमित हैं. डॉ. पी. विजया अंत में कहा कि एआई डॉक्टरों को तेज़ और सटीक जानकारी देकर हजारों ज़िंदगियां बचाने में मदद कर सकता है और स्ट्रोक का बोझ कम कर सकता है.
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