छिंदवाड़ा में 30 फीट की ऊंचाई पर हवा में झूलते हैं श्रद्धालु, मेघनाथ मेले में जारी है आदिवासियों की परंपरा
छिंदवाड़ा में आस्था और परंपरा के नाम पर 250 सालों से भी अधिक समय से चली आ रही परंपरा. उमरेठ में लगता है मेघनाथ मेला.
By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : March 5, 2026 at 8:31 PM IST
छिंदवाड़ा: उमरेठ में आज भी एक साहसिक परंपरा जीवित है. यह ऐतिहासिक मेघनाथ मेला न केवल आस्था का केंद्र है बल्कि यहां आदिवासी संस्कृति और रावण पुत्र मेघनाथ के प्रति आदिवासियों की गहरी आस्था और श्रद्धा का एक अनूठा उदाहरण देखने को मिलता है. लगभग 30 फीट की ऊंचाई पर हवा में श्रद्धालु झूलते हैं. मान्यता पूरी होने पर श्रद्धालुओं को खूंटी पर बांधकर हवा में गोल-गोल घुमाया जाता है. जो मेले का सबसे खतरनाक और मुख्य हिस्सा है.
आस्था और परंपरा के नाम पर लगाते हैं जान की बाजी
वैसे तो दुनिया में कई तरह के खतरनाक खेल होते हैं, जिन्हें देख और सुनकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं. ऐसे ही हमारे देश में भी कई लोग आस्था और परंपरा के नाम पर जान की बाजी लगाते हैं. ऐसा ही परंपरा के नाम पर एक खेल छिंदवाड़ा जिले के उमरेठ में भी खेला जाता है. यहां यह खेल रंगों के त्योहार होली से मेघनाथ मेला शुरू होता है और पंचमी तक चलता है.
250 सालों से भी अधिक समय से चली आ रही परंपरा
मेघनाथ मेला हर साल उमरेठ में बड़ी धूमधाम के साथ लगता है. इस मेले में बड़ी संख्या में आसपास के गांव के लोग समेत दूसरे राज्यों के लोग भी कई बार मेला देखने के लिए आते हैं.
समिति अध्यक्ष ओंकार मालवीयने बताया कि "मेघनाथ मेले की परंपरा लगभग 250 साल पुरानी है. उनकी कई पीढ़ियां इस मेले को देखते आ रही हैं. इस मेले में बड़ी संख्या में लोग आकर मान्यताएं मांगते हैं. जब उनकी मन्नत पूरी हो जाती है तब खंडेरा बाबा के ऊपर चढ़कर मान्यता अनुसार एक से लेकर पांच चक्कर तक राउंड घूमते हैं. इसमें हर उम्र का व्यक्ति शामिल हो सकता है."
उमरेठ गांव में चर्चित है ये किवदंती
खंडेरा बाबा समिति अध्यक्ष ओंकार मालवीयने बताया कि "बहुत पुरानी बात है जब उमरेठ के गांव में किसी प्रकार की सुख समृद्धि नहीं होती थी. जब भी यहां कोई बसना चाहता था तो यहां कोई ना कोई प्राकृतिक आपदा के कारण वह पूर्णत नष्ट हो जाता था. जब से यहां पर खंडेरा बाबा और मां निकुम्बला देवी की स्थापना हुई उसके बाद यहां पर किसी प्रकार की कोई प्राकृतिक आपदा के कारण गांव उजड़ा नहीं. इसके बाद से ही यहां लगातार हर साल होली से 5 दिनों तक मेघनाथ मेला लगता है."
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मान्यताओं और परंपरा का समावेश है मेघनाथ मेला
आज के युग में भी आदिवासियों के लिए रावण उनके आराध्य हैं. उनके पुत्र मेघनाथ मां निकुम्बला देवी के भक्त थे, जिनकी आराधना आदिवासी समाज के लोग करते हैं. खंडेरा बाबा के पास आकर लोग मन्नत मांगते हैं और जब उनकी मान्यताएं पूरी हो जाती हैं, तब यहां पर आकर लगभग 30 फीट की ऊंचाई पर एक मोटी लकड़ी से उन्हें कपड़ा या रस्सी के सहारे कमर पर बांध दिया जाता है. और फिर उन्हें उनकी मान्यता के अनुसार एक से पांच चक्कर तक घुमाया जाता है. आदिवासी समाज के लोग आज भी परंपरा और मान्यताओं का निर्वहन करते चले आ रहे हैं.